जयपुर : पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन बुधवार को अणुविभा केंद्र, मालवीय नगर में ‘स्वाध्याय दिवस’ के अवसर पर आध्यात्मिक सेमिनार का आयोजन हुआ। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि ‘मैं कौन हूं’ की खोज का नाम ही स्वाध्याय है। जिस साहित्य को पढ़ते-पढ़ते व्यक्ति स्वयं को पढ़ने लगे, वही सार्थक स्वाध्याय है। उन्होंने कहा कि आत्मा की खोज करना अध्यात्म है और स्वाध्याय इसी आध्यात्मिक यात्रा की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
मुनिश्री ने बताया कि जैन धर्म के प्राचीनतम आगम ग्रंथ ‘आयारो’ (आचारांग) की शुरुआत भी ‘मैं कौन हूं’ जैसे आत्मबोध के प्रश्न से होती है। उन्होंने कहा कि धार्मिक जीवन का मूल उद्देश्य बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि स्वयं को जानना और पहचानना है। स्व की खोज में किया गया प्रत्येक प्रयास व्यक्ति को आत्मबोध की ओर ले जाता है।
इस अवसर पर मुनिश्री ने भगवान महावीर के 27 पूर्व भवों की कथा का वाचन भी प्रारंभ किया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुरूप ही फल प्राप्त होता है। अनादि आत्मा के साथ जुड़ी अनादि कर्म-श्रृंखला ही संसार में भ्रमण का आधार है। इस कर्म-बंधन की श्रृंखला को तोड़ने का मार्ग धर्म और अध्यात्म है।
मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने स्वाध्याय के पांच प्रमुख रूपों की चर्चा करते हुए कहा कि स्व को जानने के उद्देश्य से पढ़ना-पढ़ाना, प्रश्न करना, बार-बार चिंतन-मनन करना, अनुचिंतन करना तथा दूसरों को सत्य का मार्ग बताना भी स्वाध्याय का ही स्वरूप है।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रेक्षाध्यान के प्रयोग से हुआ। इसके बाद तीर्थंकर भक्ति का आयोजन किया गया। तेरापंथ महिला मंडल (शहर) की बहनों ने मंगल गीत प्रस्तुत किया।
रात्रिकालीन कार्यक्रम में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की माता महासती कौशल्या जी के जीवन-चरित्र का श्रवण कराया गया। इसके पश्चात रहस्यमयी नवकल्पी भक्तामर साधना का विशेष उपक्रम हुआ। कार्यक्रम से पूर्व सामूहिक प्रतिक्रमण का आयोजन भी किया गया, जिसमें करीब 350 श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष श्री प्रवीण जी जैन ने बताया कि गुरुवार को पर्युषण महापर्व के अंतर्गत अणुविभा केंद्र में ‘सामायिक दिवस’ पर अभिनव सामायिक का आयोजन किया जाएगा।








