जयपुर : पर्युषण महापर्व के छठे दिन मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में भगवान महावीर के जन्मोत्सव की कथा का आयोजन श्रद्धा और उल्लास के साथ हुआ। सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में भगवान महावीर के जन्मोत्सव का जयघोष गूंज उठा और पूरा वातावरण आध्यात्मिक भावनाओं से सराबोर हो गया।
इस अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण जी महाराज के सुशिष्य मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि “महावीर की संतानें केवल महावीर को ही नहीं मानें, बल्कि महावीर की भी मानें।” उन्होंने कहा कि भगवान महावीर को आदर्श मानना तभी सार्थक है, जब उनके जीवन और शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर उन्हें अपने आचरण में उतारा जाए।
मुनिश्री ने भगवान महावीर के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने गर्भ में रहते हुए ही यह संकल्प कर लिया था कि उनके कारण माता-पिता को किसी प्रकार का कष्ट न हो। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि हम सभी महावीर की संतान हैं और हमारा भी दृढ़ संकल्प होना चाहिए कि हम अपने माता-पिता सहित किसी भी व्यक्ति को न सताएं और न ही अपने व्यवहार से किसी को कष्ट दें।
जाप से पाप, ताप और संताप का हरण
पर्युषण महापर्व के निर्धारित ‘जप दिवस’ की चर्चा करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि जाप पाप, ताप और संताप का हरण करने वाला है। उन्होंने ‘जप’ की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि वास्तविक जप वही है, जो व्यक्ति को जन्म-मरण के बंधन और पापों से मुक्ति की दिशा में ले जाए।
मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि श्रद्धा और आस्था के साथ किया गया जप जीवन में अद्भुत परिणाम देता है तथा साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और चमत्कारिक प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं।
कार्यक्रम में श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ सभा के पूर्व अध्यक्ष श्री राजकुमार जी बरड़िया ने जोशीले गीत के माध्यम से अपने भाव प्रस्तुत किए। तेरापंथ महिला मंडल शहर की अध्यक्षा श्रीमती कौशल्या जी जैन ने अखण्ड जप कार्यक्रम की जानकारी दी। इस अवसर पर मंडल की बहनों द्वारा सामूहिक गीत की सुंदर प्रस्तुति भी दी गई।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर मल्लिनाथ प्रभु की स्तुति से हुआ। इसके पश्चात प्रेक्षाध्यान एवं प्रत्याख्यान के आध्यात्मिक प्रयोग कराए गए।
इस अवसर पर सूरतगढ़ निवासी एवं जयपुर प्रवासी श्री प्रकाशचन्द जी नौलखा की धर्मपत्नी श्रीमती शकुन्तला जी नौलखा ने अठ्ठाई तप का प्रत्याख्यान किया। तपस्विनी बहिन को साहित्य भेंट कर उनकी तपस्या की अनुमोदना की गई।
पर्युषण के इस पावन अवसर पर आयोजित कार्यक्रम ने श्रद्धालुओं को भगवान महावीर के अहिंसा, संयम, करुणा और आत्मशुद्धि के संदेश को जीवन में उतारने की प्रेरणा दी।








