महिला पत्रकारों से बदसलूकी पर सुप्रीम कोर्ट में भिड़े इंदिरा जयसिंह और तुषार मेहता

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डेस्क : जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित बदसलूकी और पुलिस कार्रवाई का मामला गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चर्चा का केंद्र रहा। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच पत्रकारों के अधिकारों, पुलिस की भूमिका और विरोध प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर बहस हुई। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की।

यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में हुए प्रदर्शनों से जुड़ा है। इन प्रदर्शनों के दौरान कुछ महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर कथित तौर पर बदसलूकी, यौन उत्पीड़न और उन्हें काम करने से रोकने के आरोप लगाए थे। पुलिस की कार्रवाई और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता दिखाई।

महिला पत्रकारों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत में दलील दी कि प्रदर्शन स्थलों पर समाचार संकलन करने वाली महिला पत्रकारों की स्थिति विशेष होती है। वे वहां केवल विरोध प्रदर्शन में शामिल होने नहीं, बल्कि अपने पेशेवर दायित्वों का निर्वहन करने जाती हैं। इसलिए उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, काम करने के अधिकार और सुरक्षा की गारंटी मिलनी चाहिए।

जयसिंह ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों को पुरुष और महिला पुलिसकर्मियों की ओर से कथित तौर पर धक्का-मुक्की तथा उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस मामले की निष्पक्ष जांच और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने की मांग की।

तुषार मेहता ने उठाया पत्रकार की पहचान का सवाल

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि डिजिटल युग में पत्रकारों की पहचान करना एक चुनौती बन गया है। आज मोबाइल फोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को पत्रकार बता सकता है। ऐसे में पुलिस के सामने यह तय करना कठिन हो सकता है कि कौन वास्तव में पत्रकारिता के उद्देश्य से वहां मौजूद है।

इस पर पत्रकारों के अधिकारों और पुलिस की जवाबदेही को लेकर चर्चा हुई। अदालत के समक्ष यह सवाल भी था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान पुलिस की कार्रवाई किस सीमा तक उचित मानी जा सकती है और पत्रकारों को उनके पेशेवर काम से रोकने के आरोपों की जांच कैसे होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश बनाने के दिए संकेत

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन स्थलों पर पत्रकारों और पुलिस के बीच व्यवहार को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर दिशा-निर्देश बनाने की आवश्यकता पर विचार किया। अदालत ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से इस संबंध में जवाब मांगा।

पीठ ने महिला पत्रकार की शिकायत को गंभीर बताते हुए पुलिस को उसकी जांच करने का निर्देश दिया। साथ ही, संबंधित महिला पत्रकार के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं करने का आदेश भी दिया गया।

अदालत ने प्रदर्शन से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए हैं, ताकि आरोपों की जांच में इनका उपयोग किया जा सके।

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन से जुड़ा है मामला

दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। इसी दौरान पुलिस कार्रवाई और पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर कई याचिकाएं दायर की गईं।

अब मामले में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के जवाब तथा जांच से सामने आने वाले तथ्यों पर नजर रहेगी। सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने प्रदर्शन स्थलों पर पत्रकारों की सुरक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता और पुलिस की जवाबदेही से जुड़े मुद्दों को फिर से चर्चा में ला दिया है।