लाडनूं : तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में तेरापंथ धर्मसंघ के दूसरे योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास सुसम्पन्न कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान देदीप्यमान महासूर्य, युगप्रधान अनुशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘मन की एकाग्रता से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से वर्णित करते हुए कहा कि मनुष्य संज्ञी प्राणी होता है और मनुष्य मन वाला भी होता है। जैन तत्त्व विद्या में असंज्ञी मनुष्य भी मान्य किए गए हैं। हालांकि वे दृश्यमान नहीं होते। संज्ञी मनुष्य के पास शरीर, वाणी और मन भी होता है। ये तीन कर्मचारी उसे प्राप्त हैं। शरीर से भी कार्य होता है, मन से भी कार्य होता है और वचन से भी कार्य होता है। शरीर से आदमी कितने-कितने कार्य करता है।
मनुष्य वाणी के माध्यम से अपने विचारों का आदान-प्रदान करता है। वाणी के माध्यम से आदमी ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। वाणी विचार संप्रेषण का बहुत अच्छा साधन है। सामने वाले में श्रवण की क्षमता है और स्वयं की प्रतिभा-प्रज्ञा कुछ अच्छी हो तो ज्ञान हृदंगम किया जा सकता है। शरीर से भी कितना-कितना कार्य किया जाता है। चलना-फिरना, घूमना, बैठना, गोचरी, पानी आदि की बात होती है। हाथ जोड़कर वंदना करते हैं। हाथ से दान दिया जाता है। कितने-कितने कार्य शरीर से किए जाते हैं। इसी प्रकार मन भी कर्मकर होता है। मन प्रवृत्ति करने वाला होता है। ये तीनों मानों चेतना के कर्मचारी हैं। मन चंचलता भी रहती है। विहार हो, यात्रा हो, भोजन हो, भजन, जप हो, तपस्या आदि कुछ भी मन तो सदैव चलता रहता है। जप के दौरान कहां-कहां भटकने लग सकता है। यह मन की गतिशीलता और उसकी चंचलता है। आदमी को अपनी मन की चंचलता को कम करने का प्रयास करना चाहिए।
मन की एक अवस्था है व्यग्र और दूसरी अवस्था है एकाग्र। मन जब विविध आलंबनों पर आधारित होता रहता है तो वह मन की व्यग्रता की अवस्था होती है। जब मन एक आलम्बन पर एकाग्र हो जाए, एक विषय पर स्थापित हो जाए तो वह मन की एकाग्र अवस्था होती है। मन को एकाग्र कर लेने से चित्त का निरोध हो जाता है। मन का आलम्बन शुभ होना चाहिए। इससे चित्त का निरोध हो जाता है। मन को एकाग्र करने के लिए प्रेक्षाध्यान का उपक्रम चलता है। प्रेक्षाध्यान के द्वारा मन को एकाग्र करने का प्रयास किया जा सकता है। इस प्रकार मन की एकाग्रता पर जितना ध्यान दिया जा सके, करने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। अनेक चारित्रात्माओं ने अपने आराध्य के समक्ष अपनी जिज्ञासाएं प्रस्तुत कीं, जिसे आचार्यश्री ने उत्तरित किया।








