पात्रता के अनुरूप हो ज्ञान प्रदान : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

0
लाडनूं : जन-जन के मानस के अंधकार को अपने आध्यात्मिक ज्ञान रूपी ज्योति से आलोकित करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान एक ओर जहां साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी के 15वें दीक्षा दिवस का अवसर रहा तो दूसरी ओर अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी की ओर से अणुव्रत लेखक पुरस्कार सम्मान समारोह का भी आयोजन हुआ। आचार्यश्री ने अपने पावन प्रवचन के उपरान्त साध्वीवर्याजी को मंगल आशीर्वाद प्रदान करने के साथ ही एक दिन बाद साध्वीप्रमुखाजी के दीक्षा दिवस के संदर्भ में भी मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। वहीं पूज्य सन्निधि में उपस्थित लेखकों, कवियों और साहित्यकारों पर भी आचार्यश्री ने आशीषवृष्टि की।
मंगल देशना में परमपूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि आगम में प्रश्न किया गया है कि वाक् समाधारणा से जीव क्या प्राप्त करता है। यह समाधारणा मन, वचन और काय इन तीनों योगों से संबद्ध है। वाणी की सार्थकता इसी में है कि वह कल्याणी बनी रहे और ज्ञान के प्रसार में नियोजित हो। आचार्य भिक्षु का उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि तत्व जिज्ञासुओं को उचित समय देकर उनके संशयों का निवारण कैसे किया जाता है। समझाने का कार्य तभी सार्थक सिद्ध होता है जब बात सामने वाले के गले उतरे, जिसके लिए वक्ता का स्वयं उस सिद्धांत से सहमत होना और श्रोता की पात्रता को पहचानना अनिवार्य है। जैसे छोटे पात्र में अधिक जल डालने से वह बिखर जाता है, वैसे ही पात्रता के अनुरूप ही ज्ञान देना चाहिए। तार्किक लोगों को तर्क से और श्रद्धालुओं को उनकी श्रद्धा के अनुसार समझाना उपयुक्त रहता है। विद्वतापूर्ण विचारों को सरलीकरण के माध्यम से समझाने का प्रयास होना चाहिए। वाक् समाधारणा से सम्यक दर्शन के आयाम विशुद्ध होते हैं, मिथ्यात्व कमजोर होता है और व्यक्ति सुलभ बोधी बनता है।
साध्वीप्रमुखाश्री जी एवं साध्वीवर्या जी के दीक्षा दिवसों के संदर्भ में गुरुदेव ने कहा कि कार्तिक कृष्ण में साध्वीवर्या और साध्वीप्रमुखाजी दोनों का दीक्षा दिवस एकदम संलग्न आता है। आज साध्वीवर्या का दीक्षा दिवस है और कल साध्वीप्रमुखाजी का। दोनों ही पहले समणी रही हुई हैं। हमारे संघ में यह पहली बार हुआ है कि कोई समणी और समणी नियोजिका रही हुई साध्वी, साध्वीप्रमुखाजी के पद तक पहुँची हैं, जिन्होंने समणीकाल में विदेश यात्राएं कीं और अध्ययन-विकास किया। साध्वीवर्या भी पहले समणी रहीं और बाद में साध्वी बनीं। साध्वी समुदाय के मुख्यत्व का निर्वहन करना, सार-संभाल करना और संघ-सेवा का दायित्व मिलना बड़े भाग्य का योग होने से होता है। साध्वीवर्या मुमुक्षु बहनों, समणी श्रेणी जैसे कार्यों में संलग्न हैं ही, साथ ही प्रवास और यात्राओं में महिला समाज, कॉलेजों व परिषदों में अपने वक्तृत्व का भी सुंदर नियोजन करें। सेवा का जो यह सुंदर अवसर मिला है, उसका खूब अच्छा लाभ उठाएं। जीवन में ऐसा मौका किसी किसी को ही प्राप्त होता है। जितना दूसरों के लिए कर सके करने का प्रयास होना चाहिए। अपने कल्याण के साथ-साथ परोपकार का कार्य करते रहे।
अणुव्रत विश्व भारती सोसाइटी द्वारा अणुव्रत लेखक सम्मेलन का भी आयोजन हुआ। 30,31 अक्टूबर और एक नवंबर त्रिदिवसीय सम्मेलन का आज मंचीय उपक्रम संयोजित हुआ। इसके तहत श्री प्रकाश तातेड को अणुव्रत लेखक सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
इसमें देशभर से विभिन्न पत्रकार, लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार आदि कई प्रबुद्ध व्यक्ति सम्मिलित होने उपस्थित थे। अणुविभा अध्यक्ष श्री प्रताप दुगड़, डॉ. कुसुम लुनिया, श्री गजेंद्रसिंह सोलंकी, श्री जिनेंद्र कोठारी ने अपने विचार रखे। महामंत्री श्री मनोज सिंघवी ने संयोजन किया।