पीएम मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा पर अवध ओझा का निशाना, बोले- असहमति में मर्यादा जरूरी

0

डेस्क : लोकतंत्र में असहमति का अपना महत्व है, लेकिन असहमति को अपशब्दों में बदल देना संस्कारों और संवाद की मर्यादा को कमजोर करता है। जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल पर चर्चित शिक्षक अवध ओझा ने इसी बात को लेकर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियों का विरोध करना गलत नहीं है, लेकिन किसी को गाली देना उचित नहीं हो सकता।

अवध ओझा ने अपने विद्यार्थियों से बातचीत के दौरान जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन विरोध की भाषा में मर्यादा बनी रहनी चाहिए। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री से किसी नीति या निर्णय को लेकर असहमति हो सकती है, सरकार के कामकाज की आलोचना भी की जा सकती है, लेकिन व्यक्तिगत अपशब्दों का इस्तेमाल उचित नहीं है।

असहमति हो सकती है, सम्मान भी जरूरी

अवध ओझा ने कहा कि उनकी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कई विषयों पर असहमति है। वह सरकार के विचारों या नीतियों से सहमत नहीं होने की बात कह सकते हैं और जरूरत पड़ने पर विरोध भी करेंगे। लेकिन प्रधानमंत्री पद के प्रति सम्मान बनाए रखना वह जरूरी मानते हैं।

उनका कहना था कि लोकतंत्र की सुंदरता इसी में है कि व्यक्ति अपनी बात खुलकर कह सके। लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। विचारों का विरोध विचारों से होना चाहिए, व्यक्ति के अपमान से नहीं।

‘इसीलिए जंतर-मंतर नहीं गया’

अवध ओझा ने यह भी बताया कि जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन में वह इसी कारण शामिल नहीं हुए। उनका कहना था कि यदि वहां अपशब्दों और गाली-गलौज का वातावरण नहीं होता तो वह प्रदर्शन में शामिल हो सकते थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह विरोध के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि विरोध के दौरान भाषा की मर्यादा बनाए रखने के पक्षधर हैं।

उनकी बात का मूल संदेश यही रहा कि असहमति लोकतंत्र को मजबूत करती है, लेकिन अपमान समाज को कमजोर करता है। विरोध का स्वर जितना दृढ़ हो सकता है, उसकी भाषा उतनी ही संयमित होनी चाहिए।

संस्कारों से बनता है संवाद का रास्ता

अवध ओझा की टिप्पणी को केवल राजनीतिक बयान के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा सकता है। सार्वजनिक जीवन में मतभेद होना स्वाभाविक है। अलग-अलग विचार लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण हैं, लेकिन विचारों की भिन्नता को व्यक्तिगत कटुता में बदलना स्वस्थ संवाद के लिए बाधा बन जाता है।

जंतर-मंतर की घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपशब्द कहने वाले युवाओं को माफ करने की बात कही थी और युवाओं को प्रेम तथा समझ के साथ सही दिशा दिखाने का संदेश दिया था।

ऐसे में अवध ओझा का संदेश भी उसी व्यापक विचार की ओर संकेत करता है कि विरोध हो, सवाल हों, असहमति हो—लेकिन शब्दों में संस्कार और व्यवहार में सम्मान बना रहे। यही लोकतांत्रिक संवाद को स्वस्थ और समाज को अधिक संवेदनशील बनाता है।