नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) वाईके सभरवाल के दो बेटों चेतन सभरवाल और नितिन सभरवाल को बड़ा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने आयकर विभाग को दोनों भाइयों की आय का दोबारा आकलन (री-असेसमेंट) करने की अनुमति दे दी है। अदालत ने इस मामले में आयकर विभाग की ओर से वर्ष 2015 में जारी नोटिस को वैध ठहराते हुए दोनों भाइयों की चार अपीलें खारिज कर दीं।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 28 अक्टूबर को दिए अपने फैसले में कहा कि आयकर विभाग के पास ऐसे ठोस तथ्य मौजूद थे, जिनके आधार पर यह संदेह किया जा सकता था कि कर योग्य आय का आकलन सही तरीके से नहीं हुआ है। अदालत ने स्पष्ट किया कि री-असेसमेंट की प्रक्रिया शुरू करने के लिए आयकर अधिकारी को पहले ही यह साबित करना जरूरी नहीं है कि कर चोरी हुई है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला दिल्ली के सिकंदरा रोड स्थित एक प्राइम प्रॉपर्टी की खरीद और उससे जुड़े शेयर लेन-देन से संबंधित है। जांच के अनुसार, अक्टूबर 2007 में चेतन और नितिन सभरवाल ने दो अन्य शेयरधारकों के साथ मिलकर पवन इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड और एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड के शेयर जीवाईएस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड को बेचने का समझौता किया था।
इस सौदे में पवन इम्पेक्स के शेयरों की कीमत 195 करोड़ रुपये और एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर के शेयरों की कीमत 60 करोड़ रुपये तय की गई थी। इस तरह दोनों कंपनियों के शेयरों का कुल सौदा 255 करोड़ रुपये का था। समझौते के अनुसार, प्रत्येक शेयरधारक को कुल बिक्री राशि का एक-चौथाई हिस्सा मिलना था।
शेयरों की कीमत पर आयकर विभाग ने उठाए सवाल
आयकर विभाग की जांच में दोनों कंपनियों के शेयरों के मूल्यांकन पर सवाल उठाए गए थे। विभाग का मानना था कि शेयरों की बिक्री के लिए तय की गई कीमत कंपनियों की जमीन और इमारतों की वास्तविक कीमत के मुकाबले काफी अधिक थी।
जांच में यह भी सामने आया कि शेयरों की बिक्री से प्राप्त रकम का एक बड़ा हिस्सा अप्रैल 2010 में दिल्ली के सिकंदरा रोड स्थित संपत्ति खरीदने में इस्तेमाल किया गया था। दोनों भाइयों ने इस निवेश पर आयकर अधिनियम की धारा 54F के तहत कैपिटल गेन टैक्स में छूट का दावा भी किया था।
2015 के नोटिस को सुप्रीम कोर्ट ने माना वैध
आयकर विभाग ने जांच रिपोर्ट के आधार पर 31 मार्च 2015 को आयकर अधिनियम की धारा 147 और 148 के तहत दोबारा आकलन के लिए नोटिस जारी किया था। दोनों भाइयों ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए दलील दी थी कि पहले ही उनके वित्तीय मामलों का आकलन किया जा चुका है और बिना किसी नए ठोस आधार के दोबारा जांच शुरू नहीं की जा सकती।
दिल्ली हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद दोनों भाइयों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने उनकी अपीलें खारिज करते हुए आयकर विभाग की कार्रवाई को सही ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद आयकर विभाग अब संबंधित वित्तीय लेन-देन, शेयरों के वास्तविक मूल्य और संपत्ति खरीदने में इस्तेमाल की गई रकम की जांच आगे बढ़ा सकेगा। हालांकि, अदालत के इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि दोनों भाइयों के खिलाफ कर चोरी साबित हो गई है। लेन-देन की वास्तविकता और कर देनदारी का निर्धारण री-असेसमेंट की प्रक्रिया में किया जाएगा।









