प्रज्ञा करती है समीक्षा : युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘हाजरी निर्माता श्रीमज्जयाचार्य’ के संदर्भ में पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आगम में कहा गया है कि प्रज्ञा समीक्षा करती है। आदमी में निर्मल प्रज्ञा हो, यथार्थ के प्रति श्रद्धा हो और आदमी यथार्थ बोध करने का प्रयास करे तो यह बड़ी बात होती है। केवल अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिए तर्क-कुतर्क करना अच्छी बात नहीं होती।
सामने वाली की बात सही लग रही हो तो भी उसकी बात को नजरअंदाज कर अपनी बात का दुराग्रह रखना अच्छी बात नहीं होती। इसलिए आगम में कहा गया कि प्रज्ञा समीक्षा करती है। आज आश्विन शुक्ला चतुर्दशी है। एक महान व्यक्तित्व का जन्मदिवस है। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के चतुर्थ आचार्य, प्रज्ञापुरुष श्रीमज्जयाचार्यजी का जन्मदिवस है। वि.सं. 1860 की भाद्रव शुक्ला त्रयोदशी को तेरापंथ के आद्य अनुशास्ता आचार्यश्री भिक्षु का महाप्रयाण हुआ था और एक महीने के बाद आश्विन शुक्ला चतुर्दशी आई, उस दिन श्रीमज्जयाचार्य का एक शिशु के रूप में जन्म हुआ। बालक अवस्था में ही उनके भीतर वैराग्य की भावना जागृत हो गई। दस वर्ष पूर्व होने से पहले ही वे दीक्षित हो गए। आचार्यश्री भारमलजी के युग में मुनि रायचन्दजी से दीक्षा प्रदान करने को कहा।
उनके जन्म हुए को 223 वर्ष पूरे हो रहे हैं। गृहस्थावस्था में थे, तभी उनकी सगाई भी कर दी गई थी। ऐसे महान व्यक्तित्व का हमारे धर्मसंघ में आगमन हो गया। उन्होंने हमारे धर्मसंघ की कितनी सेवा की और धर्मसंघ के उच्चतम शिखर तक पहुंचे। उन्होंने अपने आचार्यकाल के दौरान धर्मसंघ को कई नवीनता प्रदान करने का प्रयास किया। उनमें एक है हाजरी का निर्माण। उसका पूरा नाम था गण विशुद्धिकरण हाजरी हुआ। बाद में छोटा नाम हाजरी प्रसिद्ध हो गया।
श्रीमज्जयाचार्य का वि.सं. 1910 का चतुर्मास नाथद्वारा में हुआ। चतुर्मास के बाद में रावलिया पधारे, वहां पौष महीने के कृष्ण पक्ष, दिन शनिवार को वहां संतों को प्रातःकालीन व्याख्यान में खड़े-खड़े स्वामीजी के लिखत को सुनने को कहा गया और यह नियम बन गया। बाद में सप्ताह में दो बार बोला जाने लगा। वर्तमान में पक्ष एक बार हाजरी करने का क्रम चल रहा है। वह क्रम आज भी चल रहा है।
यह श्रीमज्जयाचार्य का चलाया हुआ नियम है। वर्तमान में एक व्यापक स्वरूप बना हुआ है। न्यारा में भी इसका क्रम चलता है। यह संस्कार निर्माण का अच्छा साधन बना हुआ है। आज चतुर्दशी भी है और श्रीमज्जयाचार्य का जन्मदिवस भी है। आचार्यश्री ने उनसे संदर्भित गीत का संगान किया।
आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी के क्रम को संपादित करते हुए चारित्रात्माओं को विविध प्रेरणाएं प्रदान की। आचार्यश्री की प्रेरणा से साध्वी पद्मप्रभाजी ने लेखपत्र उच्चरित किया। आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वीजी ने दसवेआलियं के भी कुछ श्लोक उच्चरित किए। आचार्यश्री ने साध्वीजी को सात कल्याणक बक्सीस किए। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। मंगलपाठ के उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में धुलाबाड़ी से ज्ञानशाला के ज्ञानार्थी पहुंचे हुए थे। तेरापंथी सभा-धुलाबाड़ी के पूर्व अध्यक्ष श्री इन्दरचंद बोथरा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी प्रस्तुति दी। आचार्यश्री ने सभी को मंगल प्रेरणा प्रदान की। जोधपुर से भी ज्ञानशाला के ज्ञानार्थी आदि उपस्थित थे। उन्होंने ने भी अपनी प्रस्तुति दी। जोधपुरवासियों ने आचार्यश्री से चतुर्मास की भी प्रार्थना करते हुए गीत का भी संगान किया। जोधपुरवासियों को युवाचार्यश्री ने भी उद्बोधित किया। आचार्यश्री ने जोधपुरवासियों को मंगल प्रेरणा प्रदान की।