साधना का एक अंग है ध्यान : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : पर्वाधिराज पर्युषण का सातवां दिवस। आज का दिन ध्यान दिवस के रूप में समायोजित हुआ। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की सन्निधि में श्रद्धालुओं की विराट उपस्थिति देखने को मिल रही है। नित्य की भांति सूर्योदय पूर्व से ही तो धर्माराधना का प्रारम्भ हो जाता है, देर रात तक संचालित हो रहा है। इस दौरान सभी विशेष धर्माराधना में निरंतर जुटे हुए हैं।
सोमवार को प्रातःकाल के मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के लिए सुधर्मा सभा में चतुर्विध धर्मसंघ की विराट उपस्थिति थी। कार्यक्रम में ध्यान दिवस के संदर्भ में साध्वी मधुलताजी आदि साध्वियों ने गीत का संगान किया। बत्तीस आगमों में विशाल आगम भगवई और भगवती जोड़ के विषय में साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने जनता को अवगति प्रदान की। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने ध्यान दिवस पर जनता को उद्बोधित किया। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने दस धर्मों में एक ब्रह्मचर्य धर्म को व्याख्यायित किया।
तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पर्वाधिराज पर्युषण के दौरान ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के दौरान भगवान महावीर की आत्मा के अंतिम अर्थात् 27वें भव के लिए गर्भस्थ होने के बाद की कथा का वर्णनक्रम प्रारम्भ करते हुए कहा कि देवराज इन्द्र के आदेश पर उनकी आत्मा को वहां से निकालकर क्षत्राणी त्रिशला के गर्भ में स्थापित करता है और उनकी गर्भ में पहले स्थित जीव को देवानंदा के गर्भ में स्थापित किया। क्षत्राणी त्रिशला को भी चौदह स्वप्न दिखाई देते हैं। वह अपने पति सिद्धार्थ को बताती है। एक बार गर्भस्थ शिशु गर्भ में स्थिर हो गया। माता को सुख देने के लिए शिशु स्थिर हुआ तो माता उल्टे दुःखी हो गई कि शायद गर्भस्थ शिशु की मृत्यु हो गई। माता की उदासी पर गर्भस्थ शिशु ने देखकर पुनः अपना स्पंदन प्रारम्भ किया, तभी भगवान महावीर की आत्मा ने यह संकल्प कर लिया कि माता-पिता के रहते हुए दीक्षा नहीं स्वीकार करूंगा। उनका भी अपने माता-पिता के प्रति कितने समर्पण की भावना है। माता-पिता के सेवा के प्रति सभी को जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। श्रवण कुमार का नाम माता-पिता की सेवा के लिए काफी प्रचलित है।
भगवान महावीर का जन्म चैत्र शुक्ला त्रयोदशी, वि.सं. 542 में हुआ। इस अवसर पर खूब दान दिया गया। कैदियों को मुक्त किया गया। उनके नामकरण का भी उत्सव रखा गया और उत्सव के दौरान बालक का नाम वर्धमान रखा गया। बच्चे का लालन-पालन प्रारम्भ हुआ। जैसे-जैसे बालक वर्धमान बड़े हुए खेलने-कूदने लगे। वर्धमान को पढ़ने के लिए जब पाठशाला भेजा गया तो गुरु के समक्ष वर्धमान नीचे बैठे। वहां भी देवताओं ने अपने प्रयोग से पाठशाला से छुट्टी करा दी गई। जब वर्धमान बड़े हुए तो माता-पिता के समक्ष वर्धमान के विवाह का प्रसंग भी आया।
आचार्यश्री ने ध्यान दिवस के संदर्भ में पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि ध्यान की साधना बहुत अच्छी बात होती है। तेरापंथ में प्रेक्षाध्यान के माध्यम से ध्यान की बात चलती है। ध्यान भी एक साधना का अंग है। आदमी अपने भीतर की गहराईयों में जा सके, इसके लिए ध्यान का प्रयोग किया जाता है। जितना संभव हो, आदमी को ध्यान करने का प्रयास करना चाहिए। यथायोग्य ध्यान करने का प्रयास किया जा सकता है।
मंगलवार को पर्वाधिराज पर्युषण का शिखर दिवस के रूप में भगवती संवत्सरी आयोजित होगी। इस दिन चारित्रात्माएं ही नहीं, गृहस्थों में उपवास का क्रम होता है। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए जो जितना कर सकें, उतना करने का प्रयास करना चाहिए। इस दौरान जितना पौषध को भी पचखने का प्रयास करना चाहिए। संवत्सरी के दौरान क्षमापना महापर्व समायोजित होना है। कार्यक्रम के दौरान मुनि श्रेयांसकुमारजी को आचार्यश्री ने 51 की तपस्या का प्रत्याख्यान कराया।