साधु हों या गृहस्थ, व्यवहार कुशलता आवश्यक : युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण


लाडनूं :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘असभ्य वाणी से बचें’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि आगम में यह बताया गया है कि देशाटन किया जा सकता है और देशाटन करने से धर्म का प्रचार भी हो सकता है। देशाटन करने से और दीक्षाएं हो सकती हैं, दीक्षाओं में वृद्धि हो सकती है। देशाटन करने से नए-नए लोगों से मिलना होता है, जिससे अनुभव और जानकारियां भी बढ़ सकती हैं। साधु समुदाय के लिए कहा गया है कि लगातार दो चतुर्मास एक स्थान पर नहीं करना चाहिए। कोई विशेष बात हो जाए तो अलग बात है, किन्तु एक चतुर्मास काल एक क्षेत्र में करने के बाद विहार करना आवश्यक ही है।

साधु को कोई कुवचन भी बोल दे तो साधु को असभ्य वाणी से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु अपनी साधुता को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु को अपनी साधुता और संयम का परिचय देने का प्रयास करना चाहिए और असभ्य वाणी के प्रयोग से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु की भाषा अनाक्रोशपूर्ण हो, ऐसा प्रयास होना चाहिए। किसी को प्रत्युत्तर में सुना देना बड़ी बात नहीं, समतापूर्वक सहन कर लेना बड़ी बात होती है। साफ-साफ कहने वाले को साफ-साफ सुनने की क्षमता भी रखने का प्रयास करना चाहिए।

साधु तो क्या सामान्य आदमी को भी असभ्य भाषा के प्रयोग से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपनी वाणी में मिठास रखने का प्रयास करना चाहिए। कोई उचित बात हो तो उसे तरीके से कहा जा सकता है। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का ध्यान रखते हुए साधु को शांति से कोई बात कहने का प्रयास करना चाहिए।

तेज गुस्सा, आवेश आना आदमी की कमजोरी ही होती है। उस आवेश में कोई भली-बुरी बात का निकलना आदमी की एक कमजोरी ही मानी जा सकती है। असभ्य शब्द के प्रयोग से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी की भाषा अमृत के समान बने, ऐसी बात करने का प्रयास करना चाहिए। वाणी को बाण बनाने से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु को तो व्यवहार-कुशल होना चाहिए। कैसे बोलना, कैसे दूसरों से बात करना, यह भी विशेष बात होती है। साधु हों या गृहस्थ, सभी में व्यवहार कुशलता होनी चाहिए। वंदना करना भी मानों व्यवहार प्रशिक्षण का माध्यम है। अपने से बड़ों के प्रति विनय का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। वंदना आदि भी करते रहने का प्रयास करना चाहिए। विनय का भाव, समता भाव का विकास हो। विनय का भाव हमेशा रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए। कठोर शब्द रूपी विष को संयम के साथ सहन करने से आत्मा का हित भी होता है। आदमी को अपने भीतर सहिष्णुता का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। यथायोग्य विनयशीलता, समता, शांति बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को उत्तरित किया।

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