डेस्क : महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़े शिवसेना विवाद की सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने एकनाथ शिंदे के ‘मुख्य नेता’ पद को लेकर बड़ा सवाल उठाया। सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि शिवसेना के 1999 के संविधान में ‘मुख्य नेता’ नाम का कोई पद मौजूद ही नहीं था।
सिब्बल ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने कहा कि जब पार्टी के संविधान में इस पद का प्रावधान नहीं था, तो एकनाथ शिंदे को ‘मुख्य नेता’ कैसे नियुक्त किया गया। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को शिवसेना में हुई राजनीतिक बगावत और उसके बाद पार्टी पर नियंत्रण को लेकर शुरू हुए विवाद से जोड़कर अदालत के सामने रखा।
चुनाव आयोग के फैसले पर भी उठाए सवाल
कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल के संविधान को लोकतांत्रिक या गैर-लोकतांत्रिक घोषित करने की स्थिति में नहीं है। उनके मुताबिक, अगर किसी दल के संविधान को लेकर कोई आपत्ति है, तो उसका असर पार्टी की मान्यता पर हो सकता है, लेकिन उसी आधार पर किसी दूसरे गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न देने का फैसला नहीं किया जा सकता।
‘विधायकों की संख्या’ को आधार बनाने पर आपत्ति
ठाकरे गुट की ओर से यह भी दलील दी गई कि शिवसेना पर नियंत्रण तय करते समय संगठन के भीतर समर्थन को नजरअंदाज कर विधायकों की संख्या को अधिक महत्व दिया गया। सिब्बल ने कहा कि केवल विधानमंडल में संख्या के आधार पर किसी गुट को मूल राजनीतिक दल का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट में अहम मोड़
शिवसेना के नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न को लेकर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रहा विवाद महाराष्ट्र की राजनीति का बड़ा कानूनी मुद्दा बना हुआ है। बुधवार की सुनवाई में ‘मुख्य नेता’ पद के अस्तित्व और पार्टी संविधान से जुड़े सवाल सामने आने के बाद मामले की कानूनी लड़ाई और महत्वपूर्ण हो गई है।
अब सुप्रीम कोर्ट में यह देखना अहम होगा कि पार्टी के मूल संविधान, संगठनात्मक बहुमत और चुनाव आयोग के फैसले को लेकर अदालत किस दृष्टिकोण को स्वीकार करती है।








