सरस्वती देवी की धुन से ‘पड़ोसन’ के सुपरहिट गीत तक, जानिए ‘एक चतुर नार’ की पूरी कहानी

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डेस्क : हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय गीत ‘एक चतुर नार करके सिंगार’ को ज्यादातर लोग 1968 की फिल्म ‘पड़ोसन’ और किशोर कुमार, मन्ना डे तथा महमूद से जोड़कर जानते हैं। लेकिन इस मशहूर गीत की कहानी इससे करीब 27 साल पुरानी है। इसकी मूल धुन 1941 में बनी फिल्म ‘झूला’ के लिए सरस्वती देवी ने तैयार की थी और इसे अभिनेता अशोक कुमार ने अपनी आवाज दी थी।

सरस्वती देवी हिंदी सिनेमा की शुरुआती महिला संगीत निर्देशकों में सबसे महत्वपूर्ण नामों में शामिल थीं। उनका वास्तविक नाम खुर्शीद मिनोचर-होमजी था। उन्होंने बंबई टॉकीज के साथ काम करते हुए 1930 और 1940 के दशक में कई फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया। उन्हें हिंदी फिल्मों की पहली महिला संगीत निर्देशकों में माना जाता है।

‘झूला’ से शुरू हुई गीत की कहानी

1941 में आई फिल्म ‘झूला’ में अशोक कुमार और लीला चिटनिस मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म का संगीत सरस्वती देवी ने दिया था और गीतकार कवि प्रदीप थे। इसी फिल्म में ‘एक चतुर नार करके सिंगार’ पहली बार पर्दे पर आया था। उस दौर में पार्श्वगायन आज की तरह आम नहीं था, इसलिए अभिनेता अशोक कुमार ने खुद यह गीत गाया था।

गीत का यह शुरुआती रूप बाद में आने वाले संस्करण से काफी अलग था। इसकी धुन अपेक्षाकृत सरल और पारंपरिक थी, जबकि 1968 में ‘पड़ोसन’ के लिए आर. डी. बर्मन ने इसे नए अंदाज और तेज गति के साथ पेश किया।

‘पड़ोसन’ ने बनाया अमर

करीब तीन दशक बाद यही धुन ‘पड़ोसन’ में नए रूप में सामने आई। फिल्म में किशोर कुमार और मन्ना डे की आवाजों ने गीत को हास्य और संगीत की अनोखी जुगलबंदी में बदल दिया। इस प्रस्तुति ने ‘एक चतुर नार’ को हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार गीतों में शामिल कर दिया।

हालांकि, इस गीत की मूल पहचान और धुन का श्रेय सरस्वती देवी के उस दौर के काम से जुड़ा है, जब हिंदी फिल्म संगीत में महिलाओं की मौजूदगी बेहद कम थी।

सरस्वती देवी का योगदान

सरस्वती देवी ने ‘अछूत कन्या’, ‘जीवन नैया’, ‘जन्मभूमि’ और ‘झूला’ जैसी फिल्मों में संगीत दिया। ‘अछूत कन्या’ का संगीत भी उनके शुरुआती महत्वपूर्ण कामों में गिना जाता है। उन्होंने उस दौर में संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली, जब फिल्म उद्योग में यह क्षेत्र लगभग पूरी तरह पुरुषों के हाथ में था।

इसलिए ‘एक चतुर नार’ सिर्फ एक लोकप्रिय गीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस महिला संगीतकार की विरासत भी है जिसने हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में अपनी अलग पहचान बनाई और आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता तैयार किया।