लाडनूं : लाडनूं की धरा पर स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिषद में योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘तप से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि जीव तप से क्या प्राप्त करता है? तपस्या शब्द जैन शासन में प्रसिद्ध है। नव तत्त्वों में भी निर्जरा से भी तप जुड़ा हुआ है। तप के बारह प्रकार बताए गए हैं- छह बाह्य तप और छह आभ्यांतर तप। अनशन, ऊनोदरी बाह्य तप के रूप हैं तो प्रायश्चित्त, विनय आदि आभ्यांतर तप के प्रकार हो जाते हैं।
निर्जरा कार्य है और तप उसका कारण है। चतुर्मास के दौरान तप का क्रम चलता है। अनशन करना तप का एक प्रकार है। चतुर्मास के दौरान लोग अठाई, पखवाड़ा, मासखमण आदि-आदि तप करते है। तप का एक प्रकार ऊनोदरी भी हो सकता है। इसमें आदमी को अनशन की आवश्यकता नहीं होती। भूख से कुछ कम खाना ऊनोदरी होता है। खाने में कमी रखना ऊनोदरी हो जाती है। खाना खाने के बाद बार-बार पेट पर ध्यान जाता है तो माना जा सकता है कि खाने में असंयम हुआ है। भोजन के साथ उपकरणों में भी ऊनोदरी रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को केवल भोजन के लिए ही नहीं, अन्य पदार्थों में ऊनोदरी करने का प्रयास करना चाहिए। वस्त्र, पात्र आदि जो भी उपयोग की चीजें हैं, उनको यथासंभव कम ही रखने का प्रयास करना चाहिए।
आदमी को अपने भाषण में भी ऊनोदरी रखने का प्रयास करना चाहिए। कम बोलना भी अच्छी बात हो सकती है। जीवन में अंतिम समय में संथारा भी स्वीकार करना मानों तप का एक रूप है। इसी प्रकार कोई विगय का वर्जन करता है, वह भी तप का अच्छा प्रकार माना जा सकता है। यह तप आसानी से हो सकता है। जहां तक संभव हो तो पांच विगय को त्यागने का प्रयास करना चाहिए। अपने से बड़ों की वंदना करना, उनके प्रति विनय का भाव रखना भी अच्छी बात होती है। आदमी को वंदना का लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए। सेवा करना भी एक प्रकार का तप है। अग्लान भाव सेवा करना भी तप है। स्वाध्याय करना भी तप है। जिसके दो अनुकूल हो, उस तप का आलम्बन ले सकता है। तप से पूर्व कर्मों का निर्जरण कर सकता है। तपस्या से कर्मों की निर्जरा हो जाने जीव कर्म बंधनों से मुक्ति प्राप्त हो सकती है। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।
कार्यक्रम के दौरान आज आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अमृतवाणी के वार्षिक अधिवेशन का मंचीय उपक्रम रहा। इस संदर्भ में अमृतवाणी की ओर एक विडियो को प्रस्तुत किया। तदुपरान्त अमृतवाणी के नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री मदनचंद दुगड़ ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए आचार्यश्री के समक्ष अपनी नवीन टीम के नामों की घोषणा की। आचार्यश्री ने नवनिर्वाचित टीम को मंगलपाठ सुनाते हुए पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि अमृतवाणी के पास इतिहास का खजाना है। यह व्यवस्था का परिवर्तन हुआ है। खूब अच्छा धार्मिक-आध्यात्मिक कार्य चलता रहे।








