डेस्क : शिवसेना के नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बुधवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने आई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल किया कि यदि चुनाव आयोग के सामने उपलब्ध परीक्षण किसी स्पष्ट निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं थे, तो दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिह्न देकर अपने दम पर चुनाव लड़ने का विकल्प क्यों नहीं दिया गया।
सुनवाई के दौरान शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल चुनाव आयोग के उस निर्णय का बचाव कर रहे थे, जिसमें विधायी बहुमत को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया था। उनका कहना था कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के आधार पर किसी एक गुट के समर्थन का स्पष्ट आकलन करना व्यावहारिक नहीं था।
पीठ ने चुनाव चिह्न विवाद और विधायकों की अयोग्यता के मुद्दे को अलग-अलग बताया। अदालत के अनुसार, अयोग्यता का सवाल किसी विधायक के व्यक्तिगत आचरण से जुड़ा है, जबकि चुनाव चिह्न का विवाद राजनीतिक दल की पहचान और संगठन से संबंधित है।
इससे पहले उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी थी कि केवल विधायी इकाई में बहुमत के आधार पर किसी गुट को राजनीतिक दल की पहचान और चुनाव चिह्न नहीं दिया जा सकता। उनके मुताबिक राजनीतिक दल की पहचान उसके संगठन, कार्यकर्ताओं और मूल ढांचे से भी जुड़ी होती है।
शिवसेना में वर्ष 2022 में विभाजन के बाद दोनों गुटों ने पार्टी के नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न पर दावा किया था। फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न देने का फैसला किया था। आयोग ने अपने निर्णय में विधायी विंग में बहुमत को आधार बनाया था। इस फैसले को उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और मामले की सुनवाई जारी है।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, उस समय शिंदे गुट के साथ 40 विधायक और लोकसभा के 18 में से 13 सांसद थे, जबकि ठाकरे गुट के पास 15 विधायक और पांच सांसद थे। सुप्रीम कोर्ट अब चुनाव आयोग के निर्णय और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं पर सुनवाई कर रहा है।








