कोलकाता : बांग्लादेशी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता तसलीमा नसरीन करीब दो दशक बाद कोलकाता लौटीं। वर्ष 2007 में विरोध-प्रदर्शनों के बीच शहर छोड़ने के लिए मजबूर किए जाने के बाद यह उनकी पहली सार्वजनिक कोलकाता यात्रा है। वापसी के मौके पर आयोजित सम्मान समारोह में उन्होंने कहा कि किसी लेखक की सुरक्षा केवल उसकी व्यक्तिगत सुरक्षा का सवाल नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
तसलीमा नसरीन ने पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य के मुख्यमंत्री के प्रति अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आभार जताया। उन्होंने कहा कि लंबे समय से वह उस क्षण का इंतजार कर रही थीं, जब वह फिर से कह सकें कि वह कोलकाता लौट आई हैं।
उन्होंने कहा, “आज मैं कोलकाता वापस आई हूं। इस एक वाक्य के लिए मैंने कई वर्षों तक इंतजार किया है। लेखक की सुरक्षा सिर्फ लेखक की सुरक्षा नहीं है, बल्कि यह उसके बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी की सुरक्षा भी है।”
‘किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं आई हूं’
नसरीन ने स्पष्ट किया कि उनकी कोलकाता वापसी का किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि वह यहां राजनीति करने या किसी पार्टी के पक्ष में बोलने नहीं, बल्कि महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों की आवाज उठाने आई हैं।
उन्होंने कहा, “मैं यहां किसी राजनीतिक पार्टी के लिए नहीं आई हूं। मैं महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए बोलने आई हूं।”
1978 से है पश्चिम बंगाल से रिश्ता
तसलीमा ने पश्चिम बंगाल के साथ अपने पुराने रिश्ते को याद करते हुए कहा कि उनका इस राज्य से जुड़ाव करीब पांच दशक पुराना है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1978 में उन्होंने यहां की एक पत्रिका में लिखना शुरू किया था और 1980 के दशक से कोलकाता आना-जाना शुरू हो गया था। 1990 के दशक में उनकी किताब भी कोलकाता में प्रकाशित हुई।
उन्होंने कहा कि बांग्लादेश छोड़ने के बाद पश्चिम बंगाल ने उन्हें अपनापन दिया और यहां उन्हें अपना घर जैसा महसूस हुआ।
‘2007 में मुझे कोलकाता छोड़ने का आदेश दिया गया’
तसलीमा नसरीन ने वर्ष 2007 की घटना को याद करते हुए कहा कि उन्हें कोलकाता छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर उनका अपराध क्या था।
उन्होंने कहा, “मैंने किसी की हत्या नहीं की थी। बांग्लादेश ने भी मेरे प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था। अगर आप किसी की बात से सहमत नहीं हैं तो उसके खिलाफ अपनी आवाज उठाइए, लेकिन किसी की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं है।”
महिलाओं की आजादी और समानता पर जोर
नसरीन ने कहा कि उन्होंने हमेशा महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव और हिंसा का विरोध किया है। उन्होंने धार्मिक कट्टरता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि किसी धर्म के नाम पर लोगों को जबरन नियंत्रित करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि जो लोग इस्लाम के नाम पर दूसरों को नियंत्रित करना चाहते हैं, वे वास्तव में मुसलमानों के हितैषी नहीं हैं। उन्होंने शिक्षा और महिलाओं के अधिकारों को लेकर भी समान सोच की जरूरत बताई।
नसरीन ने कहा, “किसी राष्ट्र का कोई धर्म नहीं होता। राष्ट्र का मतलब है कि सभी को समान अवसर मिले। मानवता और मानव गरिमा धार्मिक सम्मान से अधिक महत्वपूर्ण हैं।”
‘अभिव्यक्ति की आजादी के बिना लोकतंत्र संभव नहीं’
कार्यक्रम में तसलीमा नसरीन ने लोकतंत्र के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि अलग विचार रखने वाले किसी लेखक या कलाकार को अपना देश छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसके बिना लोकतंत्र नहीं हो सकता। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और मेरा मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा होनी चाहिए।”
कार्यक्रम में हुआ औपचारिक स्वागत
तसलीमा नसरीन का स्वागत Secular Mission, Human Rights and Bangladesh Freedom Fighters Foundation (HRBFF) और Poschimbonger Jonno की ओर से आयोजित संयुक्त कार्यक्रम में किया गया। कार्यक्रम में भाजपा नेता और पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी भी मौजूद रहे।
अधिकारी ने कहा कि तसलीमा नसरीन की वापसी लोकतंत्र, संविधान, मौलिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि बुद्धिजीवियों और लेखकों को धमकाने या डराने का दौर अब बीत चुका है।
उन्होंने नसरीन से कहा कि जब भी उन्हें लगे, वह सुरक्षित पश्चिम बंगाल आ सकती हैं। अधिकारी ने कहा कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।
करीब दो दशक बाद तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लेखकों की सुरक्षा, महिलाओं के अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।








