जयपुर : मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में गुरुवार को श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के संस्थापक आचार्य भिक्षु का 224वां चरम दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक भावों के साथ मनाया गया। मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के सान्निध्य में श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा जयपुर की ओर से आयोजित चरमोत्सव में समाज की विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने आचार्य भिक्षु को श्रद्धासुमन अर्पित किए।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि मारवाड़ की धरती के संत भीखण जी ने लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व जिस आत्मधर्म का संदेश दिया, वह विशुद्ध अध्यात्म धर्म था। उन्होंने कहा कि इसी धर्म साधना के संगठन का नाम तेरापंथ है और आचार्य भिक्षु तेरापंथ के साथ-साथ शुद्ध अध्यात्म धर्म के संस्थापक थे।
उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु की दृष्टि में संसार का मार्ग और मोक्ष का मार्ग अलग-अलग हैं। दोनों का अपना महत्व और मूल्य है। इन दोनों को एक-दूसरे के साथ मिला देने से दोनों का महत्व प्रभावित होता है। लौकिक और लोकोत्तर धर्म के बीच के अंतर को समझकर जीवन में व्यवहार करने वाला व्यक्ति सम्यक् दृष्टि कहलाता है।
मुनिश्री ने आचार्य भिक्षु के महाप्रयाण की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके जीवन और साधना से जागरूकता तथा आत्मचिंतन की प्रेरणा ली जा सकती है। आचार्य भिक्षु का जीवन आत्मानुशासन, साधना और सत्य के प्रति दृढ़ निष्ठा का संदेश देता है।
इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी ने भिक्षु भक्ति गीत प्रस्तुत करते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु ने धर्म के संबंध में प्रचलित भ्रांतियों और गलत धारणाओं को दूर करने का प्रयास किया। इस कार्य के दौरान उन्हें अनेक विरोधों और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने सभी परिस्थितियों को समभाव से स्वीकार किया। उनके पुरुषार्थ और साधना के कारण आज धार्मिक जगत में उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया जाता है।
कार्यक्रम में श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के पूर्व अध्यक्ष ओम प्रकाश जी जैन, सहमंत्री सुरेश जी बरड़िया तथा तेरापंथ महिला मंडल शहर की पूर्व अध्यक्षा निरु जी मेहता ने अपने विचार रखे। शहर महिला मंडल की बहनों ने सुमधुर गीत प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।








