आत्मा को कर्मों से मुक्त करा लेना सबसे बड़ी स्वतंत्रता : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : शनिवार को सम्पूर्ण भारत अपने आजादी के 80वें वर्ष के उत्सव को बना रहे हैं। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में जैन विश्व भारती में तीन-तीन स्थानों पर श्रद्धालुओं, विद्यार्थियों द्वारा ध्वजारोहण अपनी आजादी का उत्सव आध्यात्मिक रूप में मनाया गया। जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय, महाप्रज्ञ प्रोग्रेसिव स्कूल तथा योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति-लाडनूं द्वारा किए गए ध्वजारोहण के स्थानों पर युगप्रधान अनुशास्ता ने पधारकर न केवल अपनी पावन सन्निधि प्रदान की, अपितु विद्यार्थियों व श्रद्धालुओं को मंगल प्रेरणा भी प्रदान की।
तदुपरान्त तेरापंथाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में लिए सुधर्मा सभा में पधारे। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘स्वतंत्रता के महत्त्व’ के माध्यम से उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आगम में आत्मानुशासन की बात बताई गई है। संयम और तप के माध्यम से आदमी अपनी आत्मा पर अनुशासन कर लेता है। आदमी अपने मन पर अनुशासन कर सकता है। जो व्यक्ति मन पर अनुशासन, वचन पर अनुशासन, काया पर अनुशासन और इन्द्रियानुशासन को साधन लेता है, उसकी निष्पत्ति होती है आत्मानुशासन। जीवन में संयम है, तप है तो आत्मा अनुशासित बन सकती है।
अनुशासन की दो विधियां प्राप्त हैं-स्वनुशासन अर्थात् स्वयं के द्वारा स्वयं को अनुशासित रखना (अपने से अपना अनुशासन) तथा दूसरा है परानुशासन। आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत आन्दोलन चलाया था। उसमें अपने से अपना अनुशासन की प्रेरणा दी गई है। अपने से अपने को देखने की बात प्रेक्षाध्यान मंे बताई जाती है। अगर आदमी आत्मानुशासन रखे तो परानुशासन कमजोर अथवा नहीं भी रख सकता है, किन्तु स्वयं पर स्वयं का अनुशासन न रहे तो फिर परानुशासन मजबूत हो सकता है। इसलिए आदमी को स्वयं के द्वारा स्वयं पर अनुशासन करने का प्रयास करना चाहिए।
आज 15 अगस्त है। भारत के लिए एक गौरवपूर्ण, महत्त्वपूर्ण दिन है। गुलामी भोगने के बाद भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की। भारत को संविधान भी लागू हुआ। किसी भी राष्ट्र, संघ, संस्था, संगठन के लिए संविधान बड़ा महत्त्वपूर्ण तत्त्व होता है। यदि संविधान अच्छा हो और उसका अच्छे से पालन हो तो राष्ट्र, संगठन, संघ, संस्था आदि अच्छे रूप में संचालित हो सकते हैं। समय-समय पर संविधान में संशोधन की अपेक्षा भी हो सकती है। बदली परिस्थिति के अनुसार संविधान में विधिक संशोधन भी हो सकता है। संस्थाओं का भी संविधान अच्छा है तो वह संघ, संस्था अच्छी चल सकती है।
भारत लोकतांत्रिक प्रणाली से चलने वाला देश है। एक राजतांत्रिक प्रणाली भी चलती है। दोनों प्रणालियां भले अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन उनका एक ही लक्ष्य है कि प्रजा सुखी हो। कोई भूखा न सोए। कोई किसी को परेशान न करे। व्यवस्थाएं अच्छे रूप में चलती रहें। प्रजा सुख महत्त्वपूर्ण होता है। भारत का यह स्वतंत्रता दिवस है। स्वतंत्रता में भी अनुशासन अपेक्षित है। अनुशासन, कर्त्तव्यनिष्ठा न हो तो आजादी का भी महत्त्व नहीं रख सकता। आदमी को यदि सुखी रहना है तो अहिंसा, संयम, नैतिकता, तप आदि का प्रभाव जीवन में रहना चाहिए। अहिंसा को एक नीति भी कहा गया है। दण्डसंहिता भी अपराधों को रोकने में सहायक बनती है। गलती की सजा न मिले तो यह संक्रामक बीमारी की तरह फैल सकता है। अपराध को रोकने में न्यायपालिका भी अपना कार्य करती है।
अपनी आत्मा को कर्मों से मुक्त कर देना सबसे बड़ी स्वतंत्रता होती है। मोहनीय कर्म की परतंत्रता से जकड़ी हुई आत्मा को संवर और निर्जरा के द्वारा स्वतंत्र कर दें तो बहुत बड़ी स्वतंत्रता की बात हो सकती है। अध्यात्म के क्षेत्र में इस स्वतंत्रता का महत्त्व है। भारत एक बहुत बढ़िया देश है। यहां संविधान का पालन भी हो रहा है। देश के नागरिकों में नैतिका का प्रभाव रहे। देश के नागरिकों में परस्पर सद्भाव भी रखने का प्रयास होना चाहिए। सभी के प्रति मैत्री का भाव रहे। ईमानदारी का जितना पालन हो सके, करने का प्रयास होना चाहिए। कार्यक्रम के दौरान जलतेदीप व माणक पत्रिका के संपादक श्री पदमचन्द मेहता ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन के दूसरे दिन भी संभागी प्रतिनिधियों को शांतिदूत आचार्यश्री से मंगल प्रेरणा प्राप्त हुई। तदुपरान्त युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने उपस्थित संभागियों को उद्बोधित करते हुए कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ के विकास में आचार्यों का योगदान रहा है तो श्रावक-श्राविकाओं का भी अपना योगदान रहा है। तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन, जहां देश भर से हजारों की संख्या में लोग उपस्थित हैं। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के लिए आचार्यश्री ने मां और संस्था शिरोमणि जैसे गरिमामयी संबोधन प्रदान किए हैं। धर्मसंघ की केन्द्रीय स्तर पर प्रतिनिधि संस्था के रूप में पूज्यप्रवर महासभा को देखते हैं तो वहीं क्षेत्रीय स्तर पर सभाओं को प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। महासभा के द्वारा जो लोकोत्तर गतिविधियां चलाई जाती हैं तो वहीं तेरापंथ विश्व भारती, आचार्य महाश्रमण इण्टरनेशनल स्कूल आदि-आदि अनेक गतिविधियां हैं। महासभा व सभाओं के मध्य स्नेह का धागा बंधा हुआ है, वह विलक्षण है। यह मां की ममता का उदाहरण है। संगठन में प्रत्येक व्यक्ति का महत्त्व है। इसलिए हमेशा संवाद का क्रम बना रहे। श्री रवि मालू ने अपने गीत का संगान किया।