अल्पोपधि होने का करें प्रयास : अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण

0
लाडनूं : जन-जन को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति का संदेश देने वाले, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘उपधि प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से विश्लेषित करते हुए कहा कि जीवन को चलाने के लिए भोजन-पानी चाहिए और उपकरण भी चाहिए। गृहस्थ का जीवन हो या अथवा साधु का, भोजन, पानी के बाद भी कई सारी चीजों की आवश्यकता होती है। पहनने को वस्त्र की, भोजन आदि के लिए पात्र की, बैठने के लिए आसन, ओढ़ने के लिए कम्बल, गृहस्थों के मकान, आभूषण आदि-आदि कितनी चीजों की आवश्यकता देखी जा सकती है। साधु के जीवन में कुछ सहयोगी चीजें अपेक्षित हो सकती हैं। प्रश्न होता है कि उपधि प्रत्याखन से क्या मिलेगा? साधु में भी दो प्रकार की धाराएं वस्त्र धारण करने वाला साधु और बिना वस्त्र के भी साधु होते हैं, जिन्हें दिगम्बर साधु भी कहा जाता है। वस्त्र रहित रहना भी एक प्रकार की साधना है।
कपड़ा है तो उसे धोना होता है, कभी फट जाए तो सूई-धागे की सिलाई की अपेक्षा होती है। उसके निरीक्षण, समेटने, सूखाने आदि-आदि कार्य करने होते हैं। फिर कहीं से कपड़े जांचने भी होते हैं। एक कपड़े के पीछे कितना समय लगाना पड़ता है। एक वस्त्र के त्याग से अथवा उपधि से स्वाध्याय आदि के लिए कितना समय मिल सकता है। कपड़ा नहीं रहने से उसकी चिंता भी नहीं रहती। जैन श्वेताम्बर परंपरा में मध्य का मार्ग है कि अल्पोपधि होने का प्रयास करना चाहिए। मूल उपधि हो, वह तो आवश्यक होती है, लेकिन अनावश्यक संग्रह नहीं होना चाहिए। प्रत्येक साधु अपने निश्रित उपकरणों का ध्यान देने का प्रयास करें और जितना हो सके, जितना हो सके अल्प करने का प्रयास करना चाहिए। स्वयं ही स्वयं का निरीक्षण अल्पोपधि होने का प्रयास करने का प्रयास होना चाहिए।
वर्तमान समय में योगक्षेम वर्ष भी चल रहा है तो यहां भी जितने चारित्रात्माएं स्वयं से स्वयं के उपधियों का निरीक्षण करें और जहां तक संभव हो अल्पोपधि बनने का प्रयास करना चाहिए। पास रहने वाले वस्तुओं का अच्छा उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। पास रहने वाले वस्तुओं का अधिक से अधिक उपयोग करने का प्रयास होना चाहिए। गुरुकुलवासी हों अथवा बहिर्विहारी, सभी अल्पोपधि होने का प्रयास करना चाहिए। इससे वजन भी हल्का हो सकता है। पात्रों आदि का सीमाकरण करने का प्रयास होना चाहिए। उपधि का अल्पीकरण करने का प्रयास होना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वी दीप्तियशाजी ने आचार्यश्री से 13 की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। आज आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में सात दिन पूर्व दीक्षित चारित्रात्माओं व समणीजी की छेदोपस्थापनीय चारित्र (बड़ी दीक्षा) का उपक्रम रहा। आचार्यश्री ने आर्षवाणी का उच्चारण करते हुए पंच महाव्रतों का तीन करण और तीन योग से स्वीकरण कराया। इसके साथ ही रात्रि भोजन विरमण व्रत को भी ग्रहण कराया। नवदीक्षित मुनिजी व साध्वीवृंद ने आचार्यश्री को विधिवत वंदन किया। नवदीक्षितों ने युवाचार्यश्री को भी वंदन किया। आचार्यश्री ने नवदीक्षित समणीजी को भी इस अवसर पर मंगल प्रेरणा प्रदान की।
कार्यक्रम के दौरान साध्वी संचितयशाजी द्वारा लिखित पुस्तक ‘लाडांजी की लाडली’ शासनश्री साध्वी सोमलताजी के जीवनवृत्त को जैन विश्व भारती के द्वारा आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। इस संदर्भ मंे साध्वी सोमलताजी के संसारपक्षीय भाई मुनि कमलकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। साध्वी रक्षितयशाजी ने भी इस संदर्भ में अपनी अभिव्यक्ति दी।