डेस्क : सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने के दौरान की गई बुलडोजर कार्रवाई को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने माना कि अधिकारियों ने कार्रवाई के दौरान अपने अधिकार की सीमा पार कर दी और ऐसी इमारत को भी ध्वस्त कर दिया, जो सरकारी जमीन का हिस्सा नहीं थी। हाईकोर्ट ने संबंधित प्राधिकरण को पूरी इमारत दोबारा बनाने और प्रभावित पक्ष को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन ने कबिता मन्ना और एक अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि पूर्व मेदिनीपुर में सरकारी जमीन से कथित अतिक्रमण हटाने के दौरान उनकी दो मंजिला व्यावसायिक इमारत भी गिरा दी गई, जबकि वह सरकारी भूमि पर नहीं बनी थी।
अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद कहा कि अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं की संपत्ति को गिराकर अपने अधिकार क्षेत्र से आगे जाकर कार्रवाई की। कोर्ट ने प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए नई इमारत के निर्माण का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित प्राधिकरण स्वीकृत नक्शे के अनुसार पूरी इमारत का पुनर्निर्माण करेगा। फैसले की प्रति मिलने की तारीख से दो वर्ष के भीतर निर्माण पूरा कर इमारत का कब्जा याचिकाकर्ताओं को सौंपना होगा। निर्माण पूरा होने तक याचिकाकर्ताओं को बिना किसी शुल्क के वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया गया है।
इसके अलावा अदालत ने संपत्ति को बिना वैध अधिकार के ध्वस्त किए जाने के लिए 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। यह राशि दो बराबर किस्तों में दी जाएगी। पहली पांच लाख रुपये की किस्त अक्टूबर 2026 के अंत तक और दूसरी पांच लाख रुपये की किस्त फरवरी 2027 के अंत तक देने का निर्देश दिया गया है।
मामला वर्ष 2024 से हाईकोर्ट के समक्ष लंबित था। अदालत के इस आदेश को अवैध और मनमानी तरीके से की गई ध्वस्तीकरण कार्रवाई के खिलाफ महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है।








