“बुज़ुर्गों को सुविधा की नहीं, साथ की अधिक आवश्यकता है” — मुनि श्री तत्व रुचि जी “तरुण”

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जयपुर : निर्माण नगर स्थित एक निजी विद्यालय के संबोधि सभागार में आयोजित “ये है जीवन की समरसता का रास्ता” विषय पर प्रेरक प्रवचन में मुनि श्री तत्व रुचि जी “तरुण” ने कहा कि जीवन केवल भौतिक सुख-सुविधाओं के सहारे नहीं चलता। जहाँ अपनत्व और प्रेम का अभाव होता है, वहाँ स्वर्ण पात्र में परोसे गए छप्पन भोग भी मनुष्य को संतोष नहीं दे सकते। उन्होंने कहा कि परिवार में यदि पारस्परिक प्रेम और वात्सल्य का भाव नहीं है तो साथ रहने का वास्तविक आनंद भी समाप्त हो जाता है।

मुनि श्री ने परिवार को विश्वास और आश्वासन का आधार बताते हुए कहा कि यही तत्व जीवन को सरल और सरस बनाते हैं। उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि संयुक्त परिवार की परंपरा भारतीय जीवन मूल्यों की विशेषता रही है, जिससे प्रत्येक सदस्य को सुरक्षा और भविष्य का भरोसा मिलता है।

उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय में टूटते रिश्ते और बिखरते परिवार समाज के लिए गंभीर संकेत हैं। इसके कारण वृद्धावस्था में अकेले रहने की स्थिति बढ़ रही है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बुज़ुर्गों को केवल सुविधाओं की नहीं, बल्कि साथ और अपनत्व की अधिक आवश्यकता होती है।

इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने कहा कि यदि परिवार प्रेमपूर्वक और मिलजुल कर रहे तो जीवन की कठिनाइयों का सामना सहजता से किया जा सकता है। उन्होंने संयुक्त परिवार व्यवस्था को जीवन की नीरसता दूर करने वाला बताया।

कार्यक्रम में प्रेक्षा प्रशिक्षिका एवं उपासिका श्रीमती विजया जी छल्लानी ने ध्यान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि धर्म में भाव-शुद्धि का विशेष स्थान है और ध्यान इसके लिए एक प्रभावी साधन है। उन्होंने धार्मिक जीवन में ध्यान को अनिवार्य रूप से अपनाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम की शुरुआत शांतिनाथ भगवान की स्तुति से हुई। अंत में “विसर्जन” नामक गेय व्याख्यान का वाचन कर त्याग की प्रेरणा दी गई। एक दिवसीय प्रत्याख्यान एवं शरण सूत्रों के संगान के साथ कार्यक्रम का विधिवत समापन हुआ।

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