धर्म का टिफिन भी हो तैयार : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण


लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक सिंचन प्रदान करने वाले, जन मानस को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति का मंगल संदेश प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘अपाथेय आगे न जाए’ को वर्णित कर पावन संबोध देते हुए कहा कि आगम में एक पथदर्शन व संदेश प्रदान किया गया है। जैन दर्शन पुनर्जन्मवाद को मानता है और उसका मजबूती के साथ प्रतिपादन भी करता है। पुनर्जन्म से संबंधित अनेक नियम जैन वाङ्मय में प्राप्त होते हैं।

किस जीव की आगति और कहां पर गति, इनके नियम प्राप्त होते हैं। अगली गति के लिए आयुष्य का कब बंध होता है, इस संदर्भ में भी आगम में बताया गया है। मनुष्य के जीवनकाल के दो हिस्से सम्पन्न होने पर उसके आगे के आयुष्य का बंध हो सकता है। आयुष्य का बंध सातवें गुणस्थान के बाद नहीं होता है। सातवें गुणस्थान में भी आयुष्य का बंध प्रारम्भ नहीं होता। इस प्रकार पुनर्जन्म के विषय में बहुत विस्तार से चर्चा की गई है।

मनुष्य को भी जब आगे जाना होता है तो उसे आगे जाने से पहले उसकी तैयारी करने का प्रयास करना चाहिए और यह ध्यान देना चाहिए कि अपाथेय में न जाए। अगली गति के लिए आदमी को अभी से तैयारी कर लेने का प्रयास करना चाहिए। रास्ता लम्बा हो और उस पर सद्गुण रूपी जल आदि सहित अपनी यात्रा का टिफिन तैयार करने का प्रयास करना चाहिए। साधु को अपने नियमों का पालन करते हुए आगे की गति पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। साधु का समय स्वाध्याय आदि में लगे। साधु को तो और अच्छे ढंग से अपनी आगे की यात्रा टिफिन तैयार करने का प्रयास करना चाहिए। जितना ज्ञान हो, उसका कंठस्थ करने का प्रयास करना चाहिए। पूरे उत्तरज्झयणाणि अथवा दसवेआलियं को ही कंठस्थ करने का प्रयास करना चाहिए। जो सेवा सापेक्ष हों, उनकी सेवा करने का प्रयास हो। सेवा करना भी निर्जरा का एक तप है। वृद्ध हों, ग्लान हों, रोगग्रस्त हों अथवा सेवा सापेक्ष हों तो उन्हें भी अपने पास रखने का प्रयास करना चाहिए अैर समुचित सेवा देने का प्रयास होना चाहिए। विनयभाव, अहोभाव से सेवा करने तथा तप करने वाले भी पाथेय को एकत्रित करने वाले होते हैं। जो पाथेय लेकर आगे की गति करते हैं, वे सुखी होते हैं।

गृहस्थ जीवन में भी आदमी को धर्म का टिफिन तैयार करने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में संयम की साधना चले, व्रत-नियमों का पालन हो, आचार शुद्ध हो, विचार अच्छे रहें, सद्कार्यों में समय का नियोजन हो तो धर्म की अच्छी टिफिन तैयार हो सकती है। श्रावक-श्राविकाओं के लिए सुमंगल साधना भी चलती है, जो अच्छा पाथेय बन सकता है। इस प्रकार गृहस्थ को अपनी अगली गति का ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। वर्तमान जीवन की अनुकूलता तो मानों पूर्वजन्म की कमाई है, जिसका फल अभी प्राप्त हो रहा है तो इस जीवन में धार्मिक कमाई करने का प्रयास हो तो ताकि आगे का जीवन भी सुखमय रह सके। गृहस्थ जीवन में जितनी संभव हो सके, सामायिक हो, जीवन में ईमानदारी रहे, नशा आदि से दूरी रहे और आध्यात्मिक-धार्मिक सेवा का प्रयास हो तो अगली गति भी पाथेय से युक्त बन सकती है।

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।

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