डेस्क : फ्रांस में बढ़ती महंगाई, शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और शिक्षकों की कमी के खिलाफ शनिवार को देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों की संख्या 4 लाख से अधिक बताई गई। राजधानी पेरिस में रैली के अंतिम चरण के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। यह प्रदर्शन पिछले सप्ताह हुई हिंसा, तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाओं के बाद हुआ है।
फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुसार, देशभर में करीब 4 लाख 10 हजार लोगों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया, जिनमें अकेले पेरिस में लगभग 1 लाख 10 हजार लोग शामिल थे। पिछले सप्ताह हुई हिंसा को देखते हुए प्रशासन ने राजधानी में मार्च के लिए सीमित मार्ग निर्धारित किया था। प्रदर्शनकारियों को शहर के उन केंद्रीय इलाकों से दूर रखा गया, जहां पिछले सप्ताह दुकानों और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया था।
कई शहरों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव
पेरिस में मार्च की शुरुआत शांतिपूर्ण रही, लेकिन पोर्ते डी विंसेंस के पास प्रदर्शन के समापन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिस पर वस्तुएं फेंकीं। इसके बाद पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। पेरिस अभियोजन कार्यालय के अनुसार, प्रदर्शन से संबंधित मामलों में 64 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि 40 लोगों को पुलिस हिरासत में रखा गया। गिरफ्तार लोगों में छह नाबालिग भी शामिल हैं।
फ्रांसीसी मीडिया के मुताबिक, लियोन, क्लेरमोंट-फेरांड और स्ट्रासबर्ग में पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया, जबकि नीस और नांत में पानी की बौछारों से भीड़ को नियंत्रित किया गया। मार्सेई में भी मार्च के समापन स्थल के पास कई दर्जन लोगों के साथ झड़पों के दौरान पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी।
गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए देशभर में 70 हजार तक पुलिसकर्मियों और सुरक्षा अधिकारियों की तैनाती की घोषणा की थी। सुरक्षा व्यवस्था के तहत हेलीकॉप्टर, बख्तरबंद वाहन और पानी की बौछार करने वाले वाहन भी तैनात किए गए।
शिक्षा व्यवस्था और बढ़ती महंगाई के खिलाफ आंदोलन
यह आंदोलन पिछले महीने पेरिस के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक विद्यालय में कर्मचारियों की कमी के विरोध से शुरू हुआ था। धीरे-धीरे यह देशव्यापी आंदोलन बन गया। इसमें छात्र बेहतर शिक्षा सुविधाओं की मांग कर रहे हैं, जबकि कर्मचारी वेतन वृद्धि और पेंशन से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं।
फ्रांस के शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 2024-25 के दौरान शिक्षकों की अनुपस्थिति के कारण सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में 1 करोड़ 54 लाख शिक्षण घंटे प्रभावित हुए। अनुपस्थित शिक्षकों की जगह दूसरे शिक्षकों की नियुक्ति नहीं होने के कारण निर्धारित शिक्षण समय का लगभग 7.5 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ।
छात्र संगठनों ने उच्च शिक्षा संस्थानों में 2 लाख 50 हजार अतिरिक्त सीटें उपलब्ध कराने और विश्वविद्यालयों में प्रवेश की मौजूदा चयन प्रक्रिया में बदलाव की मांग की है। उनकी दस सूत्रीय मांगों में शिक्षकों की संख्या बढ़ाना, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की मरम्मत कराना, छात्रों को हर महीने 200 यूरो की अतिरिक्त आर्थिक सहायता देना तथा सरकारी छात्रावासों के किराये पर रोक लगाना शामिल है।
फ्रांस की राष्ट्रीय सांख्यिकी एजेंसी आईएनएसईई के अनुसार, सितंबर में ऊर्जा की कीमतें पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 21.3 प्रतिशत अधिक थीं। इससे देश में महंगाई दर बढ़कर 3.1 प्रतिशत हो गई।
मैक्रों सरकार पर बढ़ता राजनीतिक दबाव
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के लिए यह आंदोलन राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है। उनके कार्यकाल के अंतिम महीनों में सरकार को शिक्षा, महंगाई और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। मई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल और तनावपूर्ण हो गया है।
दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी ने सरकार पर जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहने का आरोप लगाया है। पार्टी की नेता मरीन ले पेन की राजनीतिक गतिविधियों के बीच सरकार पर दबाव बढ़ रहा है।
मैक्रों ने शुक्रवार को उच्च विद्यालयों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। छात्र प्रतिनिधियों के अनुसार, राष्ट्रपति ने विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया में सुधार का आश्वासन दिया, लेकिन छात्रों ने स्पष्ट किया कि ठोस फैसलों की घोषणा होने तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
प्रदर्शनकारी संगठनों ने 31 अक्टूबर को एक और देशव्यापी रैली आयोजित करने का आह्वान किया है। वहीं, ट्रेड यूनियनों ने लियोन, नीस और मोंपेलिये सहित कई शहरों में प्रदर्शनों पर लगाए गए प्रतिबंधों की आलोचना की है। उनका कहना है कि इस तरह के प्रतिबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन हैं।
युवाओं में भविष्य को लेकर चिंता
प्रदर्शन में शामिल 27 वर्षीय इंजीनियरिंग स्नातक कैमिल चेस्नियर ने कहा कि इंजीनियरिंग और स्नातकोत्तर की डिग्री होने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिल पा रही है। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो रोजगार के अभाव में कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताने को मजबूर हैं।
पेरिस में 46 वर्षीय शिक्षिका बेनेडिक्ट पिटियोन अपनी 16 वर्षीय बेटी गारांस के साथ प्रदर्शन में शामिल हुईं। उन्होंने कहा कि छात्र लंबे समय से अपनी मांगें उठा रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज नहीं सुनी जा रही है। उनकी बेटी ने पिछले सप्ताह हुई हिंसा की तस्वीरें देखने के बाद प्रदर्शन में शामिल होने को लेकर डर व्यक्त किया, लेकिन साथ ही कहा कि आंदोलन से दूर रहने का अर्थ सरकार को जीतने देना होगा।
इस बीच, मार्सेई में प्रदर्शनकारियों की संख्या को लेकर प्रशासन और ट्रेड यूनियन के आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया। अधिकारियों ने वहां 17 हजार लोगों की मौजूदगी बताई, जबकि सीजीटी यूनियन ने यह संख्या एक लाख होने का दावा किया। टूलूज में अधिकारियों के अनुसार, 26,500 लोग प्रदर्शन में शामिल हुए।
पिछले सप्ताह की हिंसा के बाद सुरक्षा कड़ी
पिछले सप्ताह फ्रांस में पांच लाख से अधिक लोगों के सड़कों पर उतरने के दौरान व्यापक हिंसा हुई थी। इस दौरान देशभर में लगभग 3,000 दुकानों को नुकसान पहुंचने या उनमें लूटपाट होने की खबरें सामने आई थीं।
गृह मंत्री नुनेज ने सोमवार को स्वीकार किया था कि पिछले सप्ताह कुछ शहरों में पुलिस हालात पर नियंत्रण खो बैठी थी। उन्होंने इस्तीफे की पेशकश भी की थी, लेकिन राष्ट्रपति मैक्रों ने इसे स्वीकार नहीं किया।
शनिवार को पेरिस में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रही। आर्क डी ट्रायम्फ के आसपास सुरक्षा बल तैनात किए गए और कई दुकानदारों ने अपनी दुकानों के सामने सुरक्षा के लिए लकड़ी के पटरे लगा दिए। हिंसा की आशंका के कारण लौवर, ओरसे संग्रहालय, पिकासो संग्रहालय और ग्रां पैले जैसे प्रमुख सांस्कृतिक स्थलों को भी बंद रखा गया।
फ्रांस में जारी यह आंदोलन अब केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है। बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक असमानता और सरकार की नीतियों के खिलाफ बढ़ता असंतोष मैक्रों प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।









