नई दिल्ली : भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अदालत में सुनवाई के दौरान जजों की मौखिक टिप्पणियों को लेकर अहम बात कही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोर्ट रूम में जजों की ओर से कही गई बातें उनकी व्यक्तिगत राय नहीं होतीं और न ही उन्हें अदालत के अंतिम फैसले का संकेत माना जाना चाहिए।
पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के वकीलों के प्रतिनिधियों से लीगल एड डिफेंस काउंसिल योजना से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा से पहले सीजेआई ने न्यायिक प्रक्रिया को लेकर यह बात कही। उन्होंने कहा कि जब कोई जज पीठ संभालता है तो वह अपनी निजी मान्यताओं और व्यक्तिगत विचारों को पीछे छोड़कर संविधान और कानून के आधार पर मामलों की सुनवाई करता है।
क्यों पूछे जाते हैं तीखे सवाल?
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि सुनवाई के दौरान जज कई बार तीखे सवाल पूछते हैं, अस्थायी टिप्पणियां करते हैं या काल्पनिक परिस्थितियां सामने रखते हैं। इसका उद्देश्य वकीलों की दलीलों को परखना और मामले के हर पहलू को समझना होता है।
उन्होंने इसे ‘कोर्टरूम क्राफ्ट’ बताते हुए कहा कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले न्यायाधीश दोनों पक्षों के तर्कों की पूरी तरह जांच करते हैं। इसलिए सुनवाई के दौरान कही गई हर बात को अंतिम राय मानना उचित नहीं है।
फैसले और आदेश से बोलती हैं अदालतें
सीजेआई ने कहा कि अदालतें अंततः अपने फैसलों और आदेशों के जरिए बोलती हैं। मौखिक बहस और टिप्पणियां मुद्दों को समझने तथा तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचने की न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
उन्होंने यह भी चेताया कि सुनवाई के दौरान बोले गए किसी एक वाक्य, शब्द या टिप्पणी को संदर्भ से अलग करके देखने पर गलत धारणा बन सकती है। उनके मुताबिक सार्थक संवाद से गलतफहमियां दूर होती हैं और न्यायिक संस्थाओं में भरोसा मजबूत होता है।
सीजेआई ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में अलग-अलग दृष्टिकोणों के बीच संतुलन बनाते हुए निष्पक्षता और संविधान के दायरे में रहकर निर्णय तक पहुंचना जरूरी है।








