डेस्क : राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की ओर से जारी उन एडवाइजरी पर सवाल उठाए हैं, जिनमें छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को जंतर-मंतर या उसके आसपास होने वाले प्रदर्शनों में शामिल होने अथवा वहां जाने से बचने की सलाह दी गई है।
सिब्बल ने कहा कि आखिर किस सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत लोगों को जंतर-मंतर जाने से रोका जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की एडवाइजरी छात्रों, शिक्षकों और अकादमिक समुदाय को अपनी राय रखने और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने से हतोत्साहित करती हैं।
पत्रकारों से बातचीत में सिब्बल ने कहा कि देश के उच्च शिक्षण संस्थानों के कुलपतियों का इस तरह का रवैया चिंता का विषय है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या विश्वविद्यालयों के छात्रों और शिक्षकों को अपनी बात रखने, सोशल मीडिया पर विचार व्यक्त करने या किसी मुद्दे पर पक्ष लेने से भी रोका जाएगा।
सिब्बल ने कहा कि अगर छात्रों और शिक्षाविदों से केवल जिम्मेदारी से काम करने और सरकार के खिलाफ कोई राय व्यक्त नहीं करने की अपेक्षा की जाएगी, तो यह लोकतंत्र की भावना के विपरीत होगा। उन्होंने सवाल किया कि क्या सरकार चाहती है कि देश के छात्र और अकादमिक जगत सरकारी कर्मचारियों की तरह व्यवहार करें।
गौरतलब है कि जेएनयू ने अपनी एडवाइजरी में विश्वविद्यालय समुदाय के सभी सदस्यों से जंतर-मंतर और उसके आसपास होने वाले जमावड़े में शामिल होने या वहां जाने से बचने की अपील की थी। विश्वविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट के सार्वजनिक प्रदर्शनों से जुड़े निर्देशों का हवाला देते हुए सभी से जिम्मेदारी से व्यवहार करने और अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को प्राथमिकता देने को कहा था।
वहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय ने भी छात्रों और शिक्षकों के लिए सुरक्षा संबंधी एडवाइजरी जारी करते हुए जंतर-मंतर पर अनधिकृत सभाओं और प्रदर्शनों में शामिल होने से बचने की सलाह दी थी। इसी मुद्दे को लेकर कपिल सिब्बल ने विश्वविद्यालय प्रशासन और केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर देखा है।








