नक्शे पर बड़ा अफ्रीका, छोटी पश्चिमी दुनिया; क्या बदलेगा नजरिया?

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दुनिया का नक्शा केवल भौगोलिक सीमाओं का चित्र नहीं होता। वह यह भी तय करता है कि हम दुनिया को किस नजर से देखते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में समान क्षेत्रफल को अधिक सटीक रूप से दर्शाने वाले ‘इक्वल अर्थ’ प्रक्षेपण को अपनाने का फैसला इसी वजह से महज तकनीकी बदलाव नहीं है। यह भूगोल के साथ-साथ इतिहास, राजनीति और वैश्विक प्रतिनिधित्व की बहस को भी सामने लाता है।

परंपरागत मर्केटर प्रक्षेपण का इस्तेमाल सदियों से होता आया है। समुद्री नौवहन के लिए यह उपयोगी था, लेकिन इसकी एक बड़ी सीमा यह रही कि ध्रुवों के करीब के क्षेत्रों का आकार वास्तविकता से कहीं बड़ा दिखाई देता है। परिणाम यह हुआ कि यूरोप और उत्तरी अमेरिका नक्शे पर अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की तुलना में असामान्य रूप से बड़े नजर आते रहे। ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्र तो अफ्रीका के लगभग बराबर दिखाई देते हैं, जबकि वास्तविकता में दोनों के क्षेत्रफल में भारी अंतर है।

इक्वल अर्थ प्रक्षेपण इस असंतुलन को दूर करने का प्रयास करता है। इसमें महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात को अधिक सटीक ढंग से दिखाया जाता है। इसका अर्थ केवल यह नहीं कि अफ्रीका नक्शे पर बड़ा दिखाई देगा। इसका अर्थ यह भी है कि आने वाली पीढ़ियां दुनिया के भूगोल को एक अलग दृश्य संदर्भ में समझेंगी।

यहीं से इस फैसले का राजनीतिक और वैचारिक महत्व शुरू होता है।

टोगो सहित कई अफ्रीकी देशों ने लंबे समय से यह सवाल उठाया है कि दुनिया को प्रस्तुत करने के पारंपरिक तरीकों में पश्चिमी दृष्टिकोण का प्रभाव क्यों दिखाई देता है। नक्शे की एक दृश्य संरचना भी लोगों की मानसिक धारणाओं को प्रभावित कर सकती है। जिस महाद्वीप को नक्शे पर छोटा दिखाया जाता है, वह अनजाने में कम महत्वपूर्ण महसूस हो सकता है; और जो क्षेत्र बड़ा दिखाई देता है, उसे अधिक प्रभावशाली मानने की प्रवृत्ति विकसित हो सकती है।

हालांकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि केवल नक्शा बदलने से वैश्विक शक्ति-संतुलन बदल जाएगा। अमेरिका, यूरोप या किसी अन्य क्षेत्र की आर्थिक, सैन्य अथवा राजनीतिक ताकत किसी मानचित्र के आकार से निर्धारित नहीं होती। लेकिन धारणाएं भी शक्ति का एक रूप होती हैं, और नक्शा उन धारणाओं को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यही कारण है कि अमेरिका का विरोध भी इस पूरे विवाद को अधिक राजनीतिक बना देता है। वॉशिंगटन का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र को वास्तविक वैश्विक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि सदियों पुराने नक्शों और उनसे जुड़ी वैचारिक बहसों पर। इस तर्क को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया इस समय युद्ध, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक असमानता, खाद्य सुरक्षा और विस्थापन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है।

लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि क्या किसी संस्था को केवल इसलिए किसी विषय पर चर्चा नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह तत्काल युद्ध या अर्थव्यवस्था से जुड़ा नहीं है?

भूगोल की प्रस्तुति भी ज्ञान का हिस्सा है। यदि कोई मानचित्र वास्तविक क्षेत्रफल को लगातार विकृत करता है और वही चित्र दशकों तक पाठ्यपुस्तकों, मीडिया और सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल होता है, तो उसे सुधारना केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं माना जा सकता।

फ्रांस का मर्केटर प्रक्षेपण छोड़ने का फैसला इस बहस को एक और आयाम देता है। अफ्रीका के साथ अपने ऐतिहासिक और वर्तमान संबंधों को देखते हुए फ्रांस के इस कदम को कूटनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है। खासकर ऐसे समय में जब अफ्रीकी देशों में औपनिवेशिक अतीत और पश्चिमी शक्तियों की भूमिका को लेकर सवाल लगातार तेज हो रहे हैं।

फिर भी सावधानी जरूरी है। नक्शा बदलना इतिहास बदलना नहीं है। अफ्रीका का नक्शे पर बड़ा दिखना वहां की गरीबी, राजनीतिक अस्थिरता या विकास की चुनौतियों को अपने आप समाप्त नहीं करेगा। उसी तरह यूरोप और उत्तरी अमेरिका का नक्शे पर अपेक्षाकृत छोटा दिखाई देना उनकी वास्तविक वैश्विक शक्ति को कम नहीं करता।

लेकिन बदलाव का मूल्य हमेशा उसके प्रत्यक्ष परिणाम से नहीं मापा जाता। कभी-कभी किसी व्यवस्था में छोटा-सा परिवर्तन यह सवाल खड़ा करता है कि हमने चीजों को इतने लंबे समय तक एक ही तरीके से क्यों देखा।

संयुक्त राष्ट्र का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दुनिया को एक बुनियादी बात याद दिलाता है—दुनिया जैसी है, उसे वैसा ही दिखाना भी एक तरह की जिम्मेदारी है।

नक्शा दुनिया को नहीं बदलता, लेकिन दुनिया को देखने का नजरिया जरूर बदल सकता है। और शायद यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।