स्पोर्ट्स डेस्क : भारतीय पहलवान नितेश सिवाच अपने पहले एशियन गेम्स में देश के लिए पदक जीतने के इरादे से उतरने को तैयार हैं। 23 वर्षीय नितेश के लिए यह सिर्फ एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, चोट, खेल से दूरी और दोबारा वापसी की लंबी कहानी का अगला पड़ाव है।
एशियन गेम्स के ट्रायल के दौरान नितेश के पिता अपने बेटे का मुकाबला देखने पहुंचे थे। ट्रायल के बाद उन्होंने नितेश से सिर्फ एक बात कही, जो आज भी उनके लिए प्रेरणा बनी हुई है। पिता ने कहा था कि अब पीछे मुड़कर देखने का कोई सवाल नहीं है। एशियन गेम्स में पदक जीतना है और इसके बाद ओलंपिक तथा विश्व चैंपियनशिप में भी देश का नाम रोशन करना है। पिता की यह बात नितेश के मन में बस गई।
नितेश का कुश्ती से जुड़ाव भी कुछ अलग अंदाज में हुआ। वर्ष 2012 में वह प्रताप स्कूल कबड्डी खेलने पहुंचे थे। हालांकि स्कूल में कुश्ती का प्रशिक्षण भी होता था। नितेश के पिता हमेशा चाहते थे कि उनका बेटा पहलवान बने। पिता के इसी सपने के चलते नितेश ने कबड्डी छोड़कर कुश्ती को अपना लिया।
दो साल तक प्रशिक्षण लेने के बाद नितेश के घुटने का ऑपरेशन हुआ और उन्हें कुश्ती से दूर होना पड़ा। करीब दो साल तक वह खेल से लगभग पूरी तरह दूर रहे। इस दौरान उनके पिता दूध बेचने का काम करते थे और नितेश ने भी उनका हाथ बंटाना शुरू कर दिया। अखाड़े की जगह अब उनका समय दूध पहुंचाने में बीतने लगा था।
लेकिन कुश्ती उनके मन से दूर नहीं हुई। इसी दौरान उन्होंने महसूस किया कि अगर वह इतना समय दूध पहुंचाने में लगा रहे हैं, तो उसी समय को दोबारा कुश्ती में क्यों नहीं लगाया जाए। उन्होंने अपने माता-पिता से छह महीने का समय मांगा और दोबारा खेल में लौटने की अनुमति ली।
परिवार ने उनका साथ दिया और इस मौके को नितेश ने पूरी तरह भुनाया। छह महीने के भीतर उन्होंने स्कूल नेशनल में पदक जीतकर साबित कर दिया कि कुश्ती से उनका रिश्ता अभी खत्म नहीं हुआ है। यही पदक उनके करियर का दूसरा और निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
इसके बाद नितेश ने धीरे-धीरे सीनियर स्तर पर अपनी पहचान बनाई। वर्ष 2025 में एशियन चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के बाद उन्होंने 2026 में रजत पदक हासिल किया। लगातार बेहतर होते प्रदर्शन ने उन्हें अब एशियन गेम्स की टीम तक पहुंचा दिया है।
एशियन गेम्स की तैयारियों के लिए उज्बेकिस्तान में तीन सप्ताह का प्रशिक्षण शिविर भी नितेश के लिए काफी उपयोगी रहा। वहां उन्होंने उच्च स्तर के पहलवानों के साथ अभ्यास किया और अपने ग्राउंड रेसलिंग पर विशेष ध्यान दिया। नितेश का मानना है कि इस अभ्यास से उनके खेल में मजबूती आई है और एशियन गेम्स से पहले उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
हालांकि उनके सामने दबाव भी कम नहीं है। नितेश पिछले तीन-चार वर्षों से इन एशियन गेम्स की तैयारी कर रहे हैं। इसके अलावा उनकी वजन श्रेणी में अब तक किसी भारतीय पहलवान के पदक नहीं जीतने की बात भी उनके ऊपर अतिरिक्त दबाव बनाती है। नितेश मानते हैं कि पदक की उम्मीदें जहां उन्हें प्रेरित करती हैं, वहीं जरूरत से ज्यादा दबाव प्रदर्शन को प्रभावित भी कर सकता है।
इस दबाव से निपटने के लिए वह अपने कोच और माता-पिता से लगातार बातचीत करते हैं। इसके अलावा वह अपने प्रशिक्षण और मुकाबलों के वीडियो खुद देखकर अपनी कमियों को पहचानते हैं। उनका मानना है कि खेल में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और किसी एक खराब दौर को पूरी क्षमता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता।
नितेश ने अपने सफर में इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट (आईआईएस) के सहयोग को भी अहम बताया। उनके अनुसार प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के लिए यात्रा, पोषण, फिजियोथेरेपी सहित जरूरी सुविधाओं में संस्थान ने लगातार उनका साथ दिया है।
अब जब नितेश अपने पहले एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए तैयार हैं, उनकी नजर सिर्फ भागीदारी पर नहीं बल्कि पदक पर है। वह अपने माता-पिता और कोचों को अपनी सफलता का श्रेय देते हुए कहते हैं कि वह उनके लिए स्वर्ण पदक जीतना चाहते हैं।
नितेश का सपना स्पष्ट है—एशियन गेम्स में तिरंगा लहराना और राष्ट्रगान की धुन के बीच देश को गौरवान्वित करना।








