सेवा से मिलती है सफलता और आत्मिक शांति : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी

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सेवा केवल किसी के काम आने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का मार्ग है। सेवा अमृत के समान है, जो व्यक्ति को अमरता का अनुभव कराती है। सेवा करने वाला व्यक्ति दूसरों के हृदय में सदैव जीवित रहता है। सेवा ऐसा वशीकरण मंत्र है, जिसके माध्यम से व्यक्ति सबको अपना बना लेता है। ‘सेवा से ही मेवा मिलता है’ की कहावत जीवन में सेवा के महत्व को सार्थक करती है। सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती और सेवाभावी व्यक्ति पर सेवाग्राही की कृपा अवश्य बरसती है।

ये विचार मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने बुधवार को मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में ‘सेवा करें, सफल बनें’ विषय पर आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

मुनिश्री ने कहा कि जैन धर्म का मर्यादित, अनुशासित और व्यवस्थित धर्म संगठन तेरापंथ है, जिसमें सेवा साधना का विशेष महत्व है। सेवा व्यक्ति के भीतर विनम्रता, समर्पण और आत्मीयता का विकास करती है। उन्होंने तेरापंथ के नवनिर्वाचित युवाचार्य मुनि महावीर कुमार जी का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी इस सर्वोच्च उपलब्धि में अन्य गुणों के साथ उनकी सेवा भावना का भी मूल्यांकन हुआ है। वास्तव में सेवा जीवन में सिद्धि तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण सोपान है।

इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा, “सेवा धर्मः परम गहनो”। सेवा का कार्य सरल नहीं, बल्कि कठिन साधना है। संतों की सेवा का अवसर प्राप्त होना परम सौभाग्य का विषय है। सेवा व्यक्ति को समाधि की ओर ले जाने में सहायक बन सकती है। आध्यात्मिक सहयोग देना आत्मिक विकास का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि सेवा और सहयोग से परिवार, समाज तथा संगठन मजबूत होते हैं और उनकी एकता एवं अखंडता बनी रहती है। सेवा का महत्व सदैव रहा है और आगे भी इसकी आवश्यकता बनी रहेगी।

कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर सुविधिनाथ प्रभु के स्तुतिगान से हुआ। प्रवचन के दौरान जैन तत्त्वज्ञान, प्रेक्षाध्यान और जप अनुष्ठान के विभिन्न उपक्रम आयोजित किए गए। दश प्रत्याख्यान तप के क्रम में चरम प्रत्याख्यान तप का संकल्प करवाया गया। वहीं ‘भरत मुक्ति’ व्याख्यान की रोचक प्रस्तुति ने उपस्थित श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक चिंतन से जोड़ा।

अंत में मंगलपाठ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।