वर्तमान में उपवास-व्रत से भी कठिन तप है डिजिटल डिटॉक्स : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’

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जयपुर : अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में मंगलवार को चातुर्मासिक स्थापना दिवस तप-जप, त्याग और संयम की साधना के साथ मनाया गया। इस अवसर पर महाप्रज्ञ सभागार में ‘मर्यादा-अनुशासन और चातुर्मास’ विषय पर आध्यात्मिक सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साधु-संतों के सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने आत्मसंयम, त्याग और साधना के संकल्प के साथ चातुर्मास की भावना को आत्मसात किया।

इस अवसर पर मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में उपवास आदि व्रतों से भी कठिन तप डिजिटल डिटॉक्स अर्थात स्क्रीन संयम है। मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप और अन्य आधुनिक संचार साधनों ने जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन इनके अत्यधिक उपयोग ने अनेक नई समस्याओं को भी जन्म दिया है। विशेष रूप से वर्तमान पीढ़ी का अधिकांश समय डिजिटल उपकरणों के बीच व्यतीत हो रहा है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते इन संसाधनों के उपयोग पर संयम और नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका प्रभाव समाज और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।

मुनिश्री ने कहा कि तकनीक मनुष्य की सुविधा के लिए है, जीवन पर अधिकार करने के लिए नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य तकनीक का स्वामी बना रहे, उसका दास न बने। डिजिटल माध्यमों से दूरी बनाना केवल स्क्रीन से दूर होना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर लौटने की साधना भी है।

कार्यक्रम में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ने तेरापंथ संगठन के संविधान का वाचन करते हुए मर्यादा और अनुशासन के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने श्रद्धालुओं को जीवन में मर्यादा, संयम और अनुशासन को अपनाने की प्रेरणा दी।

इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि वास्तविक सुख और शांति त्याग में निहित है, जबकि भोग और असंयम मनुष्य के दुःख को बढ़ाते हैं। चातुर्मास आत्मशुद्धि, तप, त्याग, ज्ञान, ध्यान, स्वाध्याय और संयम-साधना के लिए अत्यंत अनुकूल समय है। यह काल व्यक्ति को बाहरी आकर्षणों से हटाकर अपने भीतर झांकने और आत्मचिंतन करने का अवसर प्रदान करता है।

कार्यक्रम का शुभारंभ प्रेक्षाध्यान एवं स्तुति गान से हुआ। इस अवसर पर अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने उपवास एवं बेले तप का प्रत्याख्यान कर आत्मसंयम और तपस्या का संकल्प लिया। पूरे वातावरण में आध्यात्मिकता, साधना और अनुशासन की भावना दिखाई दी।