विपत्ति समय में भी धर्म के प्रति बनी रहे श्रद्धा : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘सम्यक् दर्शन रहे सुरक्षित’ को उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि सम्यक् दर्शन की प्राप्ति होना और फिर उसका सुरक्षित रहना बड़ी बात होती है। सम्यक् दर्शन प्राप्त ही नहीं हुआ तो उसके सुरक्षा की बात ही क्या। सम्यक् दर्शन को सुरक्षित व संरक्षित रखने के लिए आठ बातें ध्यान देंगे योग्य बताए गए हैं। सम्यक् दर्शन नैश्चियिक होता है और उसका व्यावहारिक रूप भी चलता है।
जब तक कर्मों का क्षय नहीं होता, तथा जब तक दर्शन मोह का क्षय नहीं हो सकता, तब तक आदमी को मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। सातों प्रकृतियों क्षीण हो गई हैं, इसका पता कैसे चल सकता है? इसको समझने के लिए कुछ लक्षणों पर ध्यान दिया जा सकता है। मान लिया जाए कि एक पर्वत पर धुंआ उठता दिखाई दे रहा हो तो आदमी यह अनुमान लग सकता है कि उस पर्वत पर अग्नि लग गयी हैं। यह धुंए के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है। धुंए के आधार पर अग्नि का ज्ञान किया जा सकता है। अग्नि है, इस लिए धुंआ है, यह कहना भी कठिन है। व्यवहार के आधार पर चलते हुए देखा जाए कि व्यावहारिक बातें यथार्थ के प्रति श्रद्धा, रुचि है तो माना जा सकता है कि उस आदमी में सम्यक्त्व है। चेतना की वैसी विशुद्धि हो जाए कि यथार्थ के प्रति आस्था, श्रद्धा, रुचि का भाव होता है तो संभावना किया जा सकता है कि उस व्यक्ति में सम्यक्त्व हो सकता है।
संघ-संघपति के प्रति श्रद्धा, आस्था, यह व्यावहारिक बात है। अर्हत मेरे देव, शुद्ध साधु मेरे गुरु और जिन प्रज्ञप्त मेरा धर्म है, यह प्रायः सभी को स्वीकार हो सकता है। राग-द्वेष मुक्त ज्ञानियों ने जो तत्त्व बताया है, वही मेरा तत्त्व है। यह सम्यक्त्व की परिभाषा है, वह जैन धर्म में कितनी सर्वसम्मत है। हम जिस भी संप्रदाय हैं, उसके गुरु के प्रति आस्था, धर्म के प्रति गहरी आस्था, निष्ठा रखने का प्रयास करना चाहिए।
सम्यक्तव की निर्मलता के लिए आदमी को शंका से रहित रहने का प्रयास करना चाहिए। शंका नहीं रखना चाहिए। आदमी के भीतर शंका या भय हो जाने के कारण उस कार्य को आदमी छोड़ देता है। धर्म को छोड़ने का भाव नहीं होना चाहिए। आदमी को धर्म को रखने का प्रयास करना चाहिए। ऐसी प्रगाढ़ आस्था हो जाए कि प्राण जाएं तो जाएं, लेकिन धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। धन को छोड़ा जाए, लेकिन धर्म न छोड़े, ऐसी निर्भीकता जग जाए तो सम्यक् दर्शन सुरक्षित रह सकता है। किसी के व्यापार में घाटा लग जाना, किसी के प्रिय का निधन हो भी जाए तो धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। कठिनाइयों में भी आदमी को धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। विपत्ति में धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए। धर्म कोई कपड़ा नहीं जिसे पुराना होने पर बदला जा सके। जहां तक संभव हो, धर्म की प्रभावना करने का प्रयास करना चाहिए। आगम आदि के माध्यम से अच्छा विषय लेकर अच्छा प्रवचन करने का प्रयास होना चाहिए। यथार्थ के प्रति श्रद्धा का भाव बना रहे, चेतना की विशुद्धता रहे।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज साध्वी राजीमतीजी 93 वर्ष की हो गई हैं। यह भी एक उपलब्धि है। बहुश्रुत परिषद की सदस्य भी हैं। आपका संयम पर्याय और लम्बा होता रहे। अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें और जितना संभव हो धर्म की प्रभावना होती रहे। आचार्यश्री के इंगितानुसार साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी व साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने उनके प्रति अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वी कनकश्रीजी (लाडनूं), साध्वी कल्पलताजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वी राजीमतीजी ने आचार्यश्री के प्रति अपने भक्ति के भावों को अभिव्यक्ति दी। मुनि दिनेशकुमारजी, समणी नियोजिका मधुरप्रज्ञाजी ने इस विषय में अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने पुनः साध्वीजी उनके प्रति मंगलकामना की। मुनि निकुंजकुमारजी ने आचार्यश्री से 13 की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।