यमन में फिर गहराया युद्ध का खतरा, सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच बढ़ा तनाव

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सना: करीब चार साल से जमी हुई यमन की जंग एक बार फिर भड़कने के कगार पर पहुंचती दिख रही है। सऊदी अरब और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच तनाव बढ़ने के साथ ही बड़े सैन्य टकराव की आशंका गहराने लगी है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव ने भी यमन के हालात को और जटिल बना दिया है।

सऊदी अरब और हूतियों के बीच एक नाजुक संघर्षविराम ने बड़े पैमाने पर लड़ाई को काफी हद तक रोक दिया था, लेकिन इससे संघर्ष की मूल वजहों का समाधान नहीं हो सका। हूती यमन में अपनी राजनीतिक और आर्थिक पकड़ मजबूत करने के साथ-साथ देश के तेल संसाधनों से होने वाली आय पर भी नियंत्रण चाहते हैं। वहीं, स्थायी शांति के लिए चल रही बातचीत कई बार गतिरोध का शिकार हो चुकी है।

अब हालात तेजी से बदल रहे हैं और आशंका जताई जा रही है कि यमन फिर से एक विनाशकारी युद्ध की चपेट में आ सकता है।

लंदन स्थित शोध संस्थान चाथम हाउस के यमन विशेषज्ञ फारेआ अल-मुस्लिमि ने द न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में कहा कि हूतियों के लिए हर समस्या का समाधान युद्ध है, जबकि सऊदी अरब समस्याओं को पैसे के जरिए हल करने की कोशिश करता है।

क्यों बढ़ रहा है तनाव?

पिछले सऊदी-हूती संघर्ष ने यमन को अकाल के कगार पर पहुंचा दिया था। 2022 में संयुक्त राष्ट्र के समर्थन से हुए संघर्षविराम के बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई तो कम हुई, लेकिन स्थायी शांति की दिशा में बातचीत धीरे-धीरे ठप पड़ गई।

कई क्षेत्रीय संकटों से जूझ रहा सऊदी अरब लंबे समय तक इस नाजुक शांति को बनाए रखने के पक्ष में रहा। दूसरी ओर, हूतियों ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मौजूदा हालात को एक अवसर के रूप में देखा।

अधिकारियों और राजनयिकों के मुताबिक, हूतियों का मानना है कि एक और संघर्ष उन्हें यमन में अपनी पकड़ मजबूत करने और उन तेल राजस्व पर नियंत्रण हासिल करने में मदद कर सकता है, जो फिलहाल उनके कब्जे से बाहर हैं।

हूती नेता अब्दुलमलिक अल-हूती ने 16 जुलाई को एक टेलीविजन संबोधन में कहा कि उनका संगठन किसी भी स्तर के बलिदान के लिए तैयार है।

वहीं, सऊदी अरब ने सार्वजनिक रूप से संयम बरतने की अपील की है। यमन में सऊदी राजदूत मोहम्मद अल-जाबेर ने हूतियों पर “तनाव और हिंसा बढ़ाने के रास्ते” पर आगे बढ़ने का आरोप लगाया और कहा कि वे विदेशी हितों के लिए काम कर रहे हैं। उनका इशारा ईरान की ओर माना जा रहा है।

मिसाइल और ड्रोन हमलों से बढ़ी चिंता

रिपोर्ट के मुताबिक, हूती विद्रोही एक ओर ईरान का समर्थन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब और अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर यमन के भीतर राजनीतिक रियायतें देने के लिए दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

हाल के दिनों में हूतियों ने सऊदी अरब की ओर मिसाइल और ड्रोन दागे हैं। इसके अलावा लाल सागर में जहाजों को भी निशाना बनाया गया है। इससे क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा बाजारों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।

इसके जवाब में सऊदी नेतृत्व वाली सेनाओं ने हूती नियंत्रण वाले इलाकों में हवाई हमले किए हैं। वर्षों बाद इस तरह की सैन्य कार्रवाई ने संघर्ष के दोबारा व्यापक रूप लेने की आशंका बढ़ा दी है।

वाशिंगटन इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ फेलो और संयुक्त राष्ट्र की पूर्व शांति प्रक्रिया अधिकारी अप्रैल एली ने कहा कि यमन में आंतरिक युद्ध दोबारा शुरू होने की वास्तविक आशंका है।

सऊदी अरब के सामने बड़ी चुनौती

विश्लेषकों के अनुसार, हूतियों ने दबाव बढ़ाने के लिए समय का सावधानी से चुनाव किया है। व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले समुद्री मार्गों पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में सऊदी अरब तेल निर्यात के लिए लाल सागर पर पहले से अधिक निर्भर हो गया है।

इस स्थिति में लाल सागर क्षेत्र में होने वाले किसी भी हमले का आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव काफी अधिक हो सकता है।

सऊदी अरब फिलहाल बड़े सैन्य टकराव से बचने की कोशिश कर रहा है, लेकिन साथ ही हूतियों को जवाब देने के लिए अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन भी कर रहा है।

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के वरिष्ठ यमन विश्लेषक अहमद नागी के मुताबिक, रियाद संयम और प्रतिरोध के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

कैसे शुरू हुआ था यमन का युद्ध?

हूती विद्रोही यमन के उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र से उभरे थे। यह एक शिया विद्रोही आंदोलन था, जिसका रुख अमेरिका और इजरायल के खिलाफ रहा है।

2014 में ईरान के समर्थन वाले हूतियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। इसके बाद देश में गृहयुद्ध शुरू हो गया।

अपनी सीमा के पास ईरान समर्थित सशस्त्र संगठन के बढ़ते प्रभाव को सऊदी अरब ने बड़ा सुरक्षा खतरा माना और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर सैन्य हस्तक्षेप किया।

इसके बाद वर्षों तक चले संघर्ष ने यमन को दुनिया के सबसे गंभीर मानवीय संकटों में पहुंचा दिया। अंतरराष्ट्रीय दबाव और लंबे युद्ध से थकान के कारण दोनों पक्षों के बीच संघर्षविराम की राह बनी।

आज हूती विद्रोही प्रभावी रूप से उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर शासन करते हैं, जबकि सऊदी समर्थन वाली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का दक्षिणी हिस्से के बड़े क्षेत्रों पर नियंत्रण है।

शांति समझौता जो पूरा नहीं हो सका

एक समय ऐसा भी आया था जब यमन में स्थायी शांति की उम्मीद जगी थी।

2023 के अंत में सऊदी अरब और हूती विद्रोही संयुक्त राष्ट्र के समर्थन से एक राजनीतिक रोडमैप पर सहमति के करीब पहुंच गए थे। इसका उद्देश्य वर्षों से चले आ रहे संघर्ष को समाप्त करना था।

प्रस्तावित समझौते में हूती नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सरकारी कर्मचारियों के वेतन को फिर से शुरू करना एक अहम मुद्दा था। इस योजना के तहत हर साल 1 अरब से 2 अरब डॉलर तक की राशि जारी होने की उम्मीद थी। इसका बड़ा हिस्सा यमन के तेल राजस्व से आने वाला था, जबकि कमी होने पर सऊदी अरब आर्थिक मदद देने वाला था।

हालांकि, अक्टूबर 2023 में इजरायल पर हमास के हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए युद्ध ने पूरे क्षेत्र की स्थिति बदल दी।

हूतियों ने फिलिस्तीनियों के समर्थन का दावा करते हुए इजरायल और लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इस दौरान उन्होंने सऊदी अरब पर सीधे हमले से परहेज किया, लेकिन उनके अभियान के जवाब में पश्चिमी देशों ने सैन्य कार्रवाई की।

2025 में डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद उनके प्रशासन ने हूतियों को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया और उनके खिलाफ हवाई हमले किए। शोधकर्ताओं के अनुसार, इन कदमों से हूती नियंत्रण वाले क्षेत्रों में आर्थिक मुश्किलें बढ़ीं और जनता में असंतोष भी बढ़ा।

ईरानी उड़ानों को लेकर नया विवाद

शुरुआत में हूती विद्रोही अमेरिका और ईरान के बीच सीधे टकराव से काफी हद तक दूर रहे, लेकिन वाशिंगटन और तेहरान के बीच संघर्षविराम टूटने के बाद स्थिति बदल गई।

नया विवाद ईरान से सना के लिए उड़ानों को लेकर शुरू हुआ। हूतियों ने मांग की कि करीब एक साल से बंद उड़ानों के बाद एक ईरानी विमान को सना में उतरने की अनुमति दी जाए। उन्होंने उड़ानों और समुद्री मार्गों पर लगे प्रतिबंधों को नाकाबंदी बताते हुए उन्हें हटाने की मांग की। इसमें संयुक्त राष्ट्र की जांच व्यवस्था को भी खत्म करने की मांग शामिल थी।

पश्चिमी राजनयिकों ने उड़ानें बहाल करने के लिए बातचीत की, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका।

जब एक और ईरानी विमान ने सना में उतरने की कोशिश की, तो हूतियों ने सऊदी अरब पर सना हवाईअड्डे पर बमबारी करने का आरोप लगाया। वहीं, सऊदी समर्थित यमनी सरकार ने कहा कि विमान को रास्ता बदलने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से हवाई हमले किए गए थे। सरकार ने आरोप लगाया कि विमान में ईरानी हथियार ले जाए जा रहे थे। हूतियों ने इस आरोप को खारिज कर दिया।

इसके बाद हूतियों ने लाल सागर में सऊदी जहाजों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे पर नए हमले किए जाने के दावे भी सामने आए हैं।

अब अमेरिका की भूमिका अहम

यमन में शांति बनी रहेगी या देश फिर से व्यापक युद्ध की ओर बढ़ेगा, इसमें अमेरिका की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि अमेरिका चाहता है कि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी अधिक प्रभावी ढंग से संभालें। साथ ही, अमेरिका यमन में कूटनीतिक समाधान के प्रयासों का समर्थन जारी रखेगा।

हालांकि, ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। 23 जुलाई को उन्होंने धमकी दी कि यदि हूतियों ने सऊदी तेल टैंकरों पर हमले जारी रखे तो उन्हें “बड़ी सैन्य सजा” का सामना करना पड़ सकता है।

यमन एक बार फिर क्षेत्रीय संघर्ष के केंद्र में आ गया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वर्षों से चली आ रही नाजुक शांति बच पाएगी या देश फिर एक बार विनाशकारी युद्ध की ओर लौटेगा।