कषाय प्रत्याख्यान से वीतराग भाव की प्राप्ति : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मंगल प्रवचन में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘कषाय प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि आठ आत्माएं बताई गई हैं-द्रव्य आत्मा, कषाय आत्मा, योग आत्मा, उपयोग आत्मा, ज्ञान आत्मा, दर्शन आत्मा, चारित्र आत्मा और वीर्य आत्मा। इनमें दूसरी आत्मा बताई गई है-कषाय आत्मा। कषाय आत्मा को त्याज्य आत्मा बताई गई है। कषाय आत्मा का नाश किए बिना द्रव्य आत्मा मोक्ष में नहीं जा सकता। कषाय आत्मा मलीन आत्मा है। आत्मा आगे से आगे जन्म-मरण करती है। इसका कारण भी कषाय ही होता है। कर्म मल का आगमन भी कषाय के कारण ही होता है।

पुनर्जन्म का कारक भी कषाय ही है। क्रोध, मान, माया और लोभ- ये चारों कषाय पुनर्भव को पोषण देने वाले हैं। जिसके कारण जीव आगे से आगे जन्म लेता है और मृत्यु को प्राप्त होता है। क्रोध, मान, माया और लोभ योग रूप में साधु के भी होते हैं तो दोष लगता है। साधु को योग रूप कषायों को रोकने का प्रयास करना चाहिए। चारित्रात्माओं का रुझान यह रहे कि इतनी जागरूकता रहे कि योग रूप में कोई भी कषाय न आए। साधु के मन, वचन और काय तीनों योग से कषायों को दूर रखने का प्रयास करना चाहिए।

साधु को तो मन, वचन और काय से गुस्से का त्याग होता है। साधु को इससे बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु को यदि मन, वचन अथवा काया में क्रोध रूपी कषाय आता है तो वह साधुता में दोष लगाता है। साधु को इससे यथासंभव बचने का प्रयास करना चाहिए। हालांकि साधुपना नहीं जाता। साधु से कोई गलती हो भी जाए तो उससे साधुपना नहीं जाता। उसे प्रायश्चित्त लेकर अपने दोषों का शुद्धिकरण करने का प्रयास करना चाहिए। कषाय आश्रव को कोई रोक नहीं सकता। वह अन्दर में रहता ही है। कषाय प्रत्याख्यान से वीतराग भाव की प्राप्ति हो सकता है। जो वीतराग बन जाता है, वह सुख-दुःख में समभाव हो जाता है। आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों को जिज्ञासा प्रस्तुत करने का भी अवसर प्रदान किया।

साध्वी भावनाप्रभाजी ने आचार्यश्री से 15 दिन की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन विश्व भारती की 55वीं वार्षिक साधारण सभा का शुभारम्भ हुआ। इस संदर्भ में जैन विश्व भारती के अध्यक्ष श्री अमरचन्द लुंकड़, प्रधान न्यासी श्री जयंतीलाल सुराणा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने जैन विश्व भारती के पदाधिकारियों को संबोधित किया।

आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि जैन श्वेताम्बर तेरापंथ समाज की अद्वितीय संस्था जैन विश्व भारती है। जहां इतने बड़ा परिसर है, यहां मुमुक्षु, समणियां और चारित्रात्माएं निरंतर प्रवास रहता है और इतनी सारी गतिविधियां संचालित हो रही हैं। ऐसी संस्था का होना बहुत महत्त्वपूर्ण बात है। यह केन्द्रीय महत्त्वपूर्ण संस्था है। संस्था की सभी गतिविधियां अच्छी रूप में चलती रहें, यह काम्य है। इस कार्यक्रम का संचालन जैन विश्व भारती के मंत्री श्री सलिल लोढ़ा ने किया।