लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘आहार प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि जीवन के साथ भोजन और पानी का गहरा संबंध है। श्वास का तो है ही। कोई-कोई कुम्भक का प्रयोग कर लम्बा निरोध कर ले, लेकिन श्वास लिए बिना तो प्राप्त नहीं हो सकता। भोजन और पानी के बिना तो कई दिन निकाला जा सकता है, लेकिन श्वास के बिना कोई कितनी देर तक जीवित रह सकता है। शरीर को चलाने के लिए और उसे कामकाजी बनाए रखने के लिए भोजन की भी आवश्यकता होती है और पानी की आवश्यकता भी होती है। गृहस्थ हो अथवा साधु जीवन चलाने के लिए आहार-पानी की आवश्यकता होती ही है।
आहार जीवनचर्या का अंग है। शरीर से कितने-कितने लाभ प्राप्त होते हैं। शरीर सक्षम है तो साधु यात्रा कर सकता है, विहार कर सकता है, उपदेश-व्याख्यान दे सकता है, लोगों को प्रतिबोध दे सकता है, रुग्णों की सेवा कर सकता है। कोई बौद्धिक कार्य करना हो, अध्यापन आदि का तो वह भी कर सकता है। ये सभी कार्य स्वस्थ शरीर से ही प्राप्त हो सकते हैं और सभी कार्य शरीर के लाभ ही हैं। जब तक इस शरीर से लाभ प्राप्त होता रहे, तब इस शरीर को चलाने के लिए आहार-पानी आदि के रूप में भाड़ा देते रहें। स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए क्या खाना और क्या नहीं खाना, कितना खाना और कितना नहीं खाना, इसका ध्यान रखा जा सकता है। आहार में संयम और विवेक भी होना चाहिए।
आहार का प्रत्याख्यान अनेक रूपों में होता है। एक निश्चित अवधि के लिए आहार का प्रत्याख्यान हो सकता है कि मुझे एक दिन, बेला, तेला, अठाई, मासखमण आदि के रूप में भी किया जा सकता है। कुछ घंटों का भी त्याग किया जा सकता है। द्रव्यों की सीमा करना भी आहार प्रत्याख्यान में आ सकता है। आहार का प्रत्याख्यान जीवन भर के लिए अथवा निश्चित समय के लिए त्याग करना भी अच्छी बात हो सकती है।
आगम में बताया गया कि आहार का प्रत्याख्यान करने से जीव जीवन की अभिलाषा से मुक्त हो जाता है। आदमी को आहार में संयम रखा जा सकता है। किसी को वर्षीतप करना हो तो उसे भी किया जा सकता है। कोई एक दिन, दो दिन, तीन, पांच, आठ, मासखमण करना भी अच्छा हो सकता है। जितना भी आहार का संयम हो सके, उतना करने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री महाप्रज्ञजी की तीन कृतियां ‘क्या हम जैन हैं’, ‘कैसे हो गुणों का विकास’, और ‘ज्ञान का सार आचार’ जैन विश्व भारती के पदाधिकारियों द्वारा आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित की गईं। इस संदर्भ में आचार्यश्री मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। कार्यक्रम के दौरान अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद द्वारा वर्ष 2026 का ‘आचार्य महाश्रमण युवा व्यक्तित्व पुरस्कार’ श्री संदीप ललवानी को प्रदान किया गया। इस नाम की घोषणा अभातेयुप के अध्यक्ष श्री पवन माण्डोत ने किया, प्रशस्ति पत्र का वाचन महामंत्री श्री सौरभ पटावरी ने किया। श्री ललवानी ने अपने कृतज्ञभाव अभिव्यक्त किए। मुनि योगेशकुमारजी ने अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।








