जयपुर : भगवान महावीर की साधना में कायोत्सर्ग का विशेष महत्व रहा है। यह केवल शरीर को स्थिर करने की साधना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मचेतना को जागृत करने वाला आध्यात्मिक प्रयोग है। आचार्य श्री महाश्रमण जी महाराज के सुशिष्य संत मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ महाराज ने कहा कि “कायोत्सर्ग दुःख भंजक, संकट मोचक एवं आत्म रक्षक आध्यात्मिक प्रयोग है।”
मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ महाराज सोमवार को जयपुर के मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में आयोजित कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर की साधना कायोत्सर्ग प्रधान थी। भगवान महावीर ने अपने अनुभव और आत्मज्ञान के आधार पर कायोत्सर्ग को ऐसा साधना-प्रयोग बताया, जो व्यक्ति को भीतर से शांति और आत्मबल प्रदान करता है। उन्होंने उपस्थित साधकों को आत्मशुद्धि एवं आत्मजागरण के लिए नियमित रूप से कायोत्सर्ग करने की प्रेरणा दी।
कायोत्सर्ग की महत्ता बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि जीवन में आने वाले तनाव, भय और मानसिक अशांति के बीच मनुष्य स्वयं से दूर होता जा रहा है। ऐसे समय में कायोत्सर्ग व्यक्ति को अपने भीतर लौटने का अवसर देता है। शरीर की स्थिरता और मन की सजगता के माध्यम से साधक आत्मचेतना से जुड़ने का प्रयास करता है।
इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि कायोत्सर्ग से व्यक्ति भयमुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि तनाव और दबाव जैसी समस्याओं के बीच कायोत्सर्ग मानसिक शांति प्राप्त करने में सहायक हो सकता है। शरीर को स्थिर एवं शिथिल रखने की इस साधना से व्यक्ति को अपने शरीर और श्वास के प्रति सजग होने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि प्राणों का संतुलन भी स्वास्थ्य और जीवन की सहजता के लिए महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर विमल प्रभु की स्तुति के साथ हुआ। साधना एवं आध्यात्मिक चिंतन के इस आयोजन में उपस्थित श्रद्धालुओं ने कायोत्सर्ग के महत्व को समझा तथा आत्मशुद्धि और आंतरिक शांति की दिशा में साधना का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन मंगलपाठ के साथ हुआ।








