मुंबई : भारतीय रिजर्व बैंक ने करीब बाईस साल बाद शहरी सहकारी बैंकों को नए लाइसेंस देने की प्रक्रिया फिर शुरू करने का फैसला किया है। इसके लिए जल्द ही आवेदन और लाइसेंस से जुड़े दिशा-निर्देशों का मसौदा जारी किया जाएगा। रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को वित्त वर्ष दो हजार छब्बीस- सत्ताईस की तीसरी मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान इसकी घोषणा की।
दो हजार चार से लगी थी रोक
रिजर्व बैंक ने वर्ष दो हजार चार के आसपास नए शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस देने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी। उस समय कई सहकारी बैंकों में कमजोर प्रशासन, राजनीतिक हस्तक्षेप और वित्तीय अस्थिरता से जुड़े मामले सामने आए थे। अब बैंकिंग क्षेत्र में हुए बदलावों को देखते हुए केंद्रीय बैंक ने लाइसेंस देने की प्रक्रिया दोबारा शुरू करने का निर्णय लिया है।
रिजर्व बैंक ने जनवरी दो हजार छब्बीस में इस संबंध में एक परिचर्चा पत्र जारी किया था। अब हितधारकों से सुझाव लेने के लिए लाइसेंस से जुड़े दिशा-निर्देशों का मसौदा जारी किया जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था में लगातार आवेदन की सुविधा शामिल होगी। इसके तहत पात्र संस्थाएं निर्धारित शर्तें पूरी करने के बाद लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकेंगी।
ग्रामीण सहकारी बैंकों के नियम भी बदलेंगे
रिजर्व बैंक ने ग्रामीण सहकारी बैंकों की ऋण निगरानी व्यवस्था की भी व्यापक समीक्षा करने का फैसला किया है। मौजूदा ऋण निगरानी से जुड़े निर्देश वर्ष दो हजार आठ में जारी किए गए थे। पिछले वर्षों में बैंकिंग और सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में हुए बदलावों को देखते हुए अब इन नियमों को नए सिरे से तैयार करने की तैयारी है।
केंद्रीय बैंक के अनुसार, नए दिशा-निर्देशों में ऋण वितरण से जुड़े जोखिम और निगरानी व्यवस्था को ध्यान में रखा जाएगा। प्रस्तावित बदलावों पर हितधारकों से सुझाव भी लिए जाएंगे।
निदेशकों के कार्यकाल पर भी सख्ती
रिजर्व बैंक ने शहरी सहकारी बैंकों के निदेशकों के कार्यकाल को लेकर भी नियम कड़े किए हैं। नए प्रावधानों के तहत कोई व्यक्ति लगातार दस वर्ष से अधिक समय तक बैंक के निदेशक मंडल में नहीं रह सकेगा। दस वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बाद दोबारा निदेशक बनने के लिए तीन वर्ष की अनिवार्य अंतराल अवधि पूरी करनी होगी।
रिजर्व बैंक के अनुसार, कुछ मामलों में निदेशक निर्धारित कार्यकाल से अधिक समय तक पद पर बने रहने के लिए इस्तीफा देकर जल्द ही दोबारा निर्वाचित या सह-नामित हो जाते थे। नए नियमों का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था पर रोक लगाना और सहकारी बैंकों के प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है।








