जयपुर : मनुष्य की अनेक समस्याओं का मूल बाहर नहीं, उसकी अपनी दृष्टि में छिपा होता है। जब व्यक्ति अपनी ही बात को अंतिम सत्य मानकर दूसरों के विचारों को अस्वीकार कर देता है, तब संवाद का स्थान विवाद ले लेता है और सहमति की जगह संघर्ष जन्म लेने लगता है। ऐसे में अनेकान्त दृष्टि केवल एक दर्शन नहीं, बल्कि जीवन को देखने और समझने की कला बन जाती है।
अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में गुरुवार को ‘वैश्विक समस्याओं के समाधान में अनेकान्त का योगदान’ विषय पर आयोजित सेमिनार में मुनिश्री तत्त्व रूचि जी ‘तरूण’ ने कहा कि “एकान्तिक आग्रह समस्या है और अनेकान्त दृष्टि उसका समाधान।” उन्होंने कहा कि अनेकान्तवाद हमें यह स्वीकार करना सिखाता है कि सत्य को केवल एक कोण से नहीं देखा जा सकता। सत्य के अनेक पक्ष हो सकते हैं और उन्हें समझने के लिए दृष्टि में विस्तार आवश्यक है।
मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि अनेकान्तवाद सिद्धान्त है और स्यादवाद उस सिद्धान्त को अभिव्यक्त करने की शैली। स्यादवाद में किसी बात को पूर्ण और अंतिम मानने के बजाय अपेक्षा और परिस्थिति के आधार पर समझने की दृष्टि है। उन्होंने कहा कि “स्यादवाद एक ऐसा समुद्र है, जिसमें सारे वाद विलीन हो जाते हैं।”
उन्होंने कहा कि समस्या चाहे व्यक्तिगत हो, पारिवारिक हो, सामाजिक हो अथवा राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय—अनेकान्तवादी दृष्टिकोण से उसके समाधान का मार्ग खोजा जा सकता है। सम्यक् दृष्टि वाला व्यक्ति स्वाभाविक रूप से अनेकान्तवादी होता है, जबकि एकान्त दृष्टि मिथ्यात्व को जन्म देती है।
मुनिश्री ने कहा कि व्यवहार में होने वाले कलह, कदाग्रह और लड़ाई-झगड़े का मूल कारण भी एकान्तिक आग्रह है। जब व्यक्ति कहता है—“मैं कहता हूं वही सत्य है और तुम कहते हो वह सत्य नहीं है”, तब संवाद की संभावना समाप्त हो जाती है। इसके विपरीत अनेकान्तवादी दृष्टि कहती है—“किसी अपेक्षा से तुम भी सत्य हो और किसी अपेक्षा से मैं भी।”
उन्होंने कहा कि अनेकान्तवादी व्यक्ति अपने विचारों में ‘ही’ के स्थान पर ‘भी’ को स्थान देता है। यही छोटा-सा परिवर्तन मनुष्य की सोच में बड़ा विस्तार ला सकता है। ‘ही’ आग्रह का प्रतीक है, जबकि ‘भी’ स्वीकार और सह-अस्तित्व का।
कार्यक्रम में मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि आंखें मनुष्य की एक ही हैं, लेकिन देखने के कोण अलग-अलग होते हैं। जिन आंखों से व्यक्ति अपनी मां को देखता है, उन्हीं आंखों से अपनी पत्नी को भी देखता है, लेकिन दोनों को देखने का भाव और दृष्टिकोण अलग होता है। यही दृष्टिकोण का अंतर आगे चलकर चिंतन और व्यवहार के अंतर का कारण बनता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद को मनभेद में बदलने से बचना ही आध्यात्मिक परिपक्वता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने दृष्टिकोण को अंतिम सत्य मानने के बजाय दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करें।
कार्यक्रम के माध्यम से उपस्थित समाजजनों का आह्वान किया गया कि एकान्तवादी आग्रह से ऊपर उठकर अनेकान्तवादी दृष्टि को जीवन का आधार बनाया जाए। आज जब व्यक्तिगत संबंधों से लेकर वैश्विक स्तर तक असहमति और संघर्ष बढ़ रहे हैं, तब अनेकान्त का संदेश केवल दर्शन का विषय नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की आवश्यकता बन गया है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे और वक्ताओं के विचारों को गंभीरता से सुना।








