भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि आते ही वातावरण में एक अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस होने लगती है। मंदिरों में घंटियों की ध्वनि, घरों में गूंजता ‘राधे-राधे’ का स्वर और कान्हा के जन्म की प्रतीक्षा करते भक्त—जन्माष्टमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के उस दिव्य अवतरण की स्मृति है, जिसने संसार को प्रेम, धर्म और कर्म का मार्ग दिखाया।
इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई जाएगी। अष्टमी तिथि का संयोग इसी दिन बन रहा है और मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात के समय हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी की पूजा में निशीथ काल का विशेष महत्व माना जाता है।
रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का संबंध रोहिणी नक्षत्र से भी विशेष रूप से जोड़ा जाता है। धार्मिक परंपरा में रोहिणी को चंद्रमा का प्रिय नक्षत्र माना गया है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर चंद्रदेव की उस इच्छा को भी पूर्ण किया, जिसमें वे नारायण के अवतार के दर्शन करना चाहते थे।
यही कारण है कि जन्माष्टमी की रात्रि केवल पूजा की रात्रि नहीं, बल्कि उस दिव्य क्षण की स्मृति है जब अधर्म के अंधकार के बीच धर्म और सत्य का प्रकाश धरती पर आया था।
इस बार बन रहा है शुभ संयोग
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अन्य शुभ ग्रह स्थितियों का विशेष संयोग बन रहा है। लेख में इसे जयंती योग से भी जोड़ा गया है। गुरु के कर्क राशि में, सूर्य के अपनी राशि सिंह में और शुक्र के तुला राशि में रहने का उल्लेख किया गया है।
आस्था की दृष्टि से ऐसे संयोगों को भगवान श्रीकृष्ण की आराधना, ध्यान और भक्ति के लिए विशेष माना जाता है।
आधी रात को होगा कान्हा का जन्मोत्सव
जन्माष्टमी की सबसे भावपूर्ण घड़ी मध्यरात्रि होती है। यही वह समय है जब भक्त भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का जन्मोत्सव मनाते हैं। लाइव हिन्दुस्तान के अनुसार इस वर्ष पूजा का समय रात 11:26 बजे से 12:11 बजे तक बताया गया है।
इस दौरान भक्त भगवान का स्मरण करते हुए बाल गोपाल का अभिषेक करते हैं, नए वस्त्र पहनाते हैं, उनका श्रृंगार करते हैं और जन्म के बाद आरती उतारते हैं।
उस क्षण मंदिरों में शंख की ध्वनि गूंजती है और चारों ओर एक ही स्वर सुनाई देता है—
“नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की।”
कान्हा को क्या अर्पित करें?
भगवान श्रीकृष्ण को माखन और मिश्री अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। जन्माष्टमी पर बाल गोपाल को माखन-मिश्री का भोग लगाने की परंपरा है। इसके साथ ही उन्हें फल, मिठाई और अन्य सात्विक प्रसाद अर्पित किया जा सकता है।
श्रीकृष्ण के श्रृंगार में मोरपंख और बांसुरी का विशेष महत्व है। जन्माष्टमी पर बाल गोपाल को मोरपंख, बांसुरी, वैजयंती माला और चांदी की पायल अर्पित करने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।
लेकिन भगवान को अर्पित की जाने वाली सबसे बड़ी चीज कोई वस्तु नहीं, बल्कि भक्त का भाव है।
कृष्ण भक्ति का असली अर्थ
श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपना धर्म और कर्म नहीं छोड़ना चाहिए। कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया गीता का संदेश आज भी जीवन का मार्गदर्शन करता है।
कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को अपने कर्म पर अधिकार है, परिणाम पर नहीं। यही संदेश जन्माष्टमी को केवल उत्सव नहीं रहने देता, बल्कि इसे आत्मचिंतन का अवसर बना देता है।
इस जन्माष्टमी पर जब हम कान्हा के सामने दीप जलाएं, तो केवल अपनी इच्छाओं की सूची न रखें। उनसे अपने भीतर प्रेम, धैर्य, विवेक और सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति भी मांगें।
क्योंकि कृष्ण का जन्म केवल मथुरा की उस कारागार में नहीं हुआ था—
कृष्ण का जन्म हर उस हृदय में होता है, जहां प्रेम होता है, करुणा होती है और सत्य के लिए खड़े होने का साहस होता है।
इस जन्माष्टमी कान्हा से यही प्रार्थना करें—
“हे मुरलीधर, हमारे जीवन के अंधकार को अपने ज्ञान के प्रकाश से दूर कर दीजिए। हमारे मन में प्रेम, वाणी में मधुरता और कर्म में धर्म का भाव भर दीजिए।”
जय श्रीकृष्ण।








